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कितने और ठिकाने थे!
हमको सारी रात जगाया जलते बुझते तारों ने, हम क्यूँ उनके दर पर उतरे कितने और ठिकाने थे| इब्न-ए-इंशा
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इसके लाख बहाने थे!
ये लड़की तो इन गलियों में रोज़ ही घूमा करती थी, इससे उनको मिलना था तो इसके लाख बहाने थे| इब्न-ए-इंशा
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इंशा-जी दीवाने थे!
वहशत का उनवान हमारी उनमें से जो नार बनी, देखेंगे तो लोग कहेंगे ‘इंशा’-जी दीवाने थे| इब्न-ए-इंशा
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ओस-बिंदु सम ढरके!
आज मैं एक प्रमुख राष्ट्रवादी हिन्दी कवि पद्मभूषण स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा नवीन जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा नवीन जी की यह कविता – हम तो ओस-बिंदु सम ढरकेआए इस जड़ता में चेतन तरल रूप कुछ…
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आँखों में अफ़्साने थे!
ज़िद्दी वहशी अल्लहड़ चंचल मीठे लोग रसीले लोग, होंट उनके ग़ज़लों के मिसरे आँखों में अफ़्साने थे| इब्न-ए-इंशा
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सब जाने-पहचाने थे!
रात के ख़्वाब सुनाएँ किसको, रात के ख़्वाब सुहाने थे, धुँदले धुँदले चेहरे थे पर सब जाने-पहचाने थे| इब्न-ए-इंशा
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कम है तो मुझे क्या!
मैं सरमद ओ मंसूर बना हूँ तिरी ख़ातिर, ये भी तिरी उम्मीद से कम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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सनम है तो मुझे क्या!
पत्थर न पड़ें गर सर-ए-बाज़ार तो कहना, तू मोतरिफ़-ए-हुस्न-ए-सनम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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सुक़रात का अंजाम!
भूला तो न होगा तुझे सुक़रात का अंजाम, हाथों में तिरे साग़र-ए-सम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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मैंने तो पुकारा है!
मैंने तो पुकारा है मोहब्बत के उफ़क़ से, रस्ते में तिरे संग-ए-हरम है तो मुझे क्या|