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और बोझल हो गया!
अब कहाँ होगा वो और होगा भी तो वैसा कहाँ, सोच कर ये बात जी कुछ और बोझल हो गया| मुनीर नियाज़ी
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शाम रंगों में ढली!
मैं अकेला और सफ़र की शाम रंगों में ढली, फिर ये मंज़र मेरी नज़रों से भी ओझल हो गया| मुनीर नियाज़ी
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शहर जल-थल हो गया
वो हवा थी शाम ही से रस्ते ख़ाली हो गए, वो घटा बरसी कि सारा शहर जल-थल हो गया| मुनीर नियाज़ी
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चाँद ने पानी में देखा!
अपनी ही तेग़-ए-अदा से आप घायल हो गया, चाँद ने पानी में देखा और पागल हो गया| मुनीर नियाज़ी
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कहीं चला भी गया!
चलो ‘मुनीर’ चलें अब यहाँ रहें भी तो क्या, वो संग-दिल तो यहाँ से कहीं चला भी गया| मुनीर नियाज़ी
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हिना की ख़ुशबू थी!
हवा थी गहरी घटा थी हिना की ख़ुशबू थी, ये एक रात का क़िस्सा लहू रुला भी गया| मुनीर नियाज़ी
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भीगा दिन!
आज एक बार फिर से मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तारसप्तक’ के एक प्रमुख हिन्दी कवि स्वर्गीय गिरिजाकुमार माथुर जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गिरिजाकुमार माथुर जी की यह कविता – भीगा दिनपश्चिमी तटों में उतर चुका है,बादल-ढकी…
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ख़ून आ भी गया
न आया कोई लब-ए-बाम शाम ढलने लगी, वुफ़ूर-ए-शौक़ से आँखों में ख़ून आ भी गया| मुनीर नियाज़ी
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जल उठी बिजली!
ग़ज़ब हुआ जो अँधेरे में जल उठी बिजली, बदन किसी का तिलिस्मात कुछ दिखा भी गया| मुनीर नियाज़ी
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नींद से जगा भी गया!
उठा तो जा भी चुका था अजीब मेहमाँ था, सदाएँ दे के मुझे नींद से जगा भी गया| मुनीर नियाज़ी