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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 3rd Jul 2023

    और बोझल हो गया!

    अब कहाँ होगा वो और होगा भी तो वैसा कहाँ, सोच कर ये बात जी कुछ और बोझल हो गया| मुनीर नियाज़ी

  • 3rd Jul 2023

    शाम रंगों में ढली!

    मैं अकेला और सफ़र की शाम रंगों में ढली, फिर ये मंज़र मेरी नज़रों से भी ओझल हो गया| मुनीर नियाज़ी

  • 3rd Jul 2023

    शहर जल-थल हो गया

    वो हवा थी शाम ही से रस्ते ख़ाली हो गए, वो घटा बरसी कि सारा शहर जल-थल हो गया| मुनीर नियाज़ी

  • 3rd Jul 2023

    चाँद ने पानी में देखा!

    अपनी ही तेग़-ए-अदा से आप घायल हो गया, चाँद ने पानी में देखा और पागल हो गया| मुनीर नियाज़ी

  • 3rd Jul 2023

    कहीं चला भी गया!

    चलो ‘मुनीर’ चलें अब यहाँ रहें भी तो क्या, वो संग-दिल तो यहाँ से कहीं चला भी गया| मुनीर नियाज़ी

  • 3rd Jul 2023

    हिना की ख़ुशबू थी!

    हवा थी गहरी घटा थी हिना की ख़ुशबू थी, ये एक रात का क़िस्सा लहू रुला भी गया| मुनीर नियाज़ी

  • 3rd Jul 2023

    भीगा दिन!

    आज एक बार फिर से मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तारसप्तक’ के एक प्रमुख हिन्दी कवि स्वर्गीय गिरिजाकुमार माथुर जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ|  उनकी कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गिरिजाकुमार माथुर जी की यह कविता – भीगा दिनपश्चिमी तटों में उतर चुका है,बादल-ढकी…

  • 2nd Jul 2023

    ख़ून आ भी गया

    न आया कोई लब-ए-बाम शाम ढलने लगी, वुफ़ूर-ए-शौक़ से आँखों में ख़ून आ भी गया| मुनीर नियाज़ी

  • 2nd Jul 2023

    जल उठी बिजली!

    ग़ज़ब हुआ जो अँधेरे में जल उठी बिजली, बदन किसी का तिलिस्मात कुछ दिखा भी गया| मुनीर नियाज़ी

  • 2nd Jul 2023

    नींद से जगा भी गया!

    उठा तो जा भी चुका था अजीब मेहमाँ था, सदाएँ दे के मुझे नींद से जगा भी गया| मुनीर नियाज़ी

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