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कोई भूली हुई दोस्त!
याद आई है तो फिर टूट के याद आई है, कोई गुज़री हुई मंज़िल कोई भूली हुई दोस्त| अहमद फ़राज़
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नज़र खा गई दोस्त!
तेरे क़ामत से भी लिपटी है अमर-बेल कोई, मेरी चाहत को भी दुनिया की नज़र खा गई दोस्त| अहमद फ़राज़
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कई दुश्मन कई दोस्त!
लोग हर बात का अफ़्साना बना देते हैं, ये तो दुनिया है मिरी जाँ कई दुश्मन कई दोस्त| अहमद फ़राज़
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ऐ अजनबी दोस्त!
तुझसे मिल कर तो ये लगता है कि ऐ अजनबी दोस्त, तू मिरी पहली मोहब्बत थी मिरी आख़िरी दोस्त| अहमद फ़राज़
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उषा स्तवन-3
आज मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ एक महत्वपूर्ण कवि स्वर्गीय मदन वात्स्यायन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| उनकी रचनाएं मैंने शायद पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मदन वात्स्यायन जी की यह कविता – मुझे पूरब की एक डायन से मुहब्बत है ।वह अप्सरा है ; उस…
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दिल ही न बुझ चले!
ये सुकून-ए-जाँ की घड़ी ढले तो चराग़-ए-दिल ही न बुझ चले, वो बला से हो ग़म-ए-इश्क़ या ग़म-ए-रोज़गार कोई तो हो| अहमद फ़राज़
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उदास से बाम ओ दर!
ये उदास उदास से बाम ओ दर ये उजाड़ उजाड़ सी रह-गुज़र, चलो हम नहीं न सही मगर सर-ए-कू-ए-यार कोई तो हो| अहमद फ़राज़
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मान लें कि चमन खिले!
कहीं तार-ए-दामन-ए-गुल मिले तो ये मान लें कि चमन खिले, कि निशान फ़स्ल-ए-बहार का सर-ए-शाख़-सार कोई तो हो| अहमद फ़राज़
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ए’तिबार कोई तो हो!
किसे ज़िंदगी है अज़ीज़ अब किसे आरज़ू-ए-शब-ए-तरब, मगर ऐ निगार-ए-वफ़ा तलब तिरा ए’तिबार कोई तो हो| अहमद फ़राज़
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बे-क़रार कोई तो हो!
न हरीफ़-ए-जाँ न शरीक-ए-ग़म शब-ए-इंतिज़ार कोई तो हो, किसे बज़्म-ए-शौक़ में लाएँ हम दिल-ए-बे-क़रार कोई तो हो| अहमद फ़राज़