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इल्ज़ाम से पहचानते हैं!
दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं, लोग अब मुझ को तिरे नाम से पहचानते हैं| क़तील शिफ़ाई
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जो मुमकिन ही नहीं है!
उस चीज़ का क्या ज़िक्र जो मुमकिन ही नहीं है, सहरा में कभी साया-ए-दीवार न माँगो| क़तील शिफ़ाई
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इज़हार न माँगो!
सच बात पे मिलता है सदा ज़हर का पियाला, जीना है तो फिर जीने का इज़हार न माँगो| क़तील शिफ़ाई
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निगाहों का भरम भी!
खुल जाएगा इस तरह निगाहों का भरम भी, काँटों से कभी फूल की महकार न माँगो| क़तील शिफ़ाई
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मसीहा की नज़र से!
गिर जाओगे तुम अपने मसीहा की नज़र से, मर कर भी इलाज-ए-दिल-ए-बीमार न माँगो| क़तील शिफ़ाई
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कभी प्यार न माँगो!
यारो किसी क़ातिल से कभी प्यार न माँगो, अपने ही गले के लिए तलवार न माँगो| क़तील शिफ़ाई
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इस बार का लंदन!
एक बार फिर मैं लंदन की यात्रा पर हूँ, यह मेरा तीसरा लंदन प्रवास है, एक माह से अधिक समय के लिए| आने पर लगता है देख लिया जाए कि सब चीजें अपनी जगह पर ही हैं न, कैनेरी वार्फ़ के स्टेशन | पिछली बार तक दो स्टेशन थे यहाँ पास में, एक जुबली लाइन…
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शीशे सा बदन!
बारिश-ए-संग का मौसम है मिरे शहर में तो, तू ये शीशे सा बदन ले के कहाँ आ गई दोस्त| अहमद फ़राज़
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तिरा दिल शामिल है!
तेरे लहजे की थकन में तिरा दिल शामिल है, ऐसा लगता है जुदाई की घड़ी आ गई दोस्त| अहमद फ़राज़
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गुज़र भी गई दोस्त!
अब भी आए हो तो एहसान तुम्हारा लेकिन, वो क़यामत जो गुज़रनी थी गुज़र भी गई दोस्त| अहमद फ़राज़