-
धब्बे और तस्वीर!
आज मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ एक महत्वपूर्ण कवि स्वर्गीय कुँवर नारायण जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| उनकी ज्यादा रचनाएं मैंने शायद पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुँवर नारायण जी की यह कविता – वह चित्र भी झूठा नहीं :तब प्रेम बचपन ही सहीसंसार ही जब…
-
ख़ाक-बसर से पहले!
चल दिए उठ के सू-ए-शहर-ए-वफ़ा कू-ए-हबीब, पूछ लेना था किसी ख़ाक-बसर से पहले| इब्न-ए-इंशा
-
इश्क़ में घर से पहले!
अपने हमराह जो आते हो इधर से पहले, दश्त पड़ता है मियाँ इश्क़ में घर से पहले| इब्न-ए-इंशा
-
मिरा मेहमाँ होता है!
वो दर्द कि उसने छीन लिया वो दर्द कि उसकी बख़्शिश था, तन्हाई की रातों में ‘इंशा’ अब भी मिरा मेहमाँ होता है| इब्न-ए-इंशा
-
रोज़ मुसलमाँ होता है!
फिर उनकी गली में पहुँचेगा फिर सहव का सज्दा कर लेगा, इस दिल पे भरोसा कौन करे हर रोज़ मुसलमाँ होता है| इब्न-ए-इंशा
-
जो पिन्हाँ होता है!
हम तेरी सिखाई मंतिक़* से अपने को तो समझा लेते हैं, इक ख़ार खटकता रहता है सीने में जो पिन्हाँ होता है| *ज्ञान इब्न-ए-इंशा
-
किसके तसव्वुर में जाने
दिल किसके तसव्वुर में जाने रातों को परेशाँ होता है, ये हुस्न-ए-तलब की बात नहीं होता है मिरी जाँ होता है| इब्न-ए-इंशा
-
बन जाता दीप्तिवान!
आज मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ एक महत्वपूर्ण कवि स्वर्गीय विजयदेव नारायण साही जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| उनकी रचनाएं मैंने शायद पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय विजयदेव नारायण साही जी की यह कविता – सूरज सवेरे से जैसे उगा ही नहीं बीत गया सारा दिन बैठे हुए…
-
शाम से पहचानते हैं!
पौ फटे क्यूँ मिरी पलकों पे सजाते हो इन्हें, ये सितारे तो मुझे शाम से पहचानते हैं| क़तील शिफ़ाई
-
अंजाम से पहचानते हैं!
आईना-दार-ए-मोहब्बत हूँ कि अरबाब-ए-वफ़ा, अपने ग़म को मिरे अंजाम से पहचानते हैं| क़तील शिफ़ाई