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चढ़ते उतरते रहते हैं!
बस एक वहशत-ए-मंज़िल है और कुछ भी नहीं, कि चंद सीढ़ियाँ चढ़ते उतरते रहते हैं| गुलज़ार
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आत्म छलना-2
श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर करने के क्रम में मैं अभी अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों में शामिल श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर कर रहा हूँ और इसके अंतर्गत आज मैं चौथा सप्तक में शामिल एक कवि स्वर्गीय स्वदेश भारती जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| उन्होंने इस एक ही शीर्षक से की…
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जब भी फ़ुर्सत होती है!
तब हम दोनों वक़्त चुरा कर लाते थे, अब मिलते हैं जब भी फ़ुर्सत होती है| जावेद अख़्तर
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कहते हैं हैरत होती है!
अक्सर वो कहते हैं वो बस मेरे हैं, अक्सर क्यूँ कहते हैं हैरत होती है| जावेद अख़्तर
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शय की क़ीमत होती है
ग़म होते हैं जहाँ ज़ेहानत होती है, दुनिया में हर शय की क़ीमत होती है| जावेद अख़्तर