-
लिए ग़ुबार चले!
न जाने कौन सी मिट्टी वतन की मिट्टी थी, नज़र में धूल जिगर में लिए ग़ुबार चले| गुलज़ार
-
रुक के बार बार चले!
रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चले, क़रार दे के तिरे दर से बे-क़रार चले| गुलज़ार
-
हरियाली के ऊपर- रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
-
आँखें झपकते रहते हैं!
भरे हैं रात के रेज़े कुछ ऐसे आँखों में, उजाला हो तो हम आँखें झपकते रहते हैं| गुलज़ार
-
ये रोटियाँ हैं ये सिक्के
ये रोटियाँ हैं ये सिक्के हैं और दाएरे हैं, ये एक दूजे को दिन भर पकड़ते रहते हैं| गुलज़ार
-
मान भी लूँ !
श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर करने के क्रम में मैं अभी अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों में शामिल श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर कर रहा हूँ और इसके अंतर्गत आज मैं चौथा सप्तक में शामिल एक कवि श्री नंदकिशोर आचार्य जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नंदकिशोर आचार्य…
-
बख़िये उधड़ते रहते हैं!
मुझे तो रोज़ कसौटी पे दर्द कसता है, कि जाँ से जिस्म के बख़िये उधड़ते रहते हैं| गुलज़ार