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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th Aug 2023

    ज़िंदगी गुज़ार चले!

    सहर न आई कई बार नींद से जागे, थी रात रात की ये ज़िंदगी गुज़ार चले| गुलज़ार

  • 7th Aug 2023

    लिए ग़ुबार चले!

    न जाने कौन सी मिट्टी वतन की मिट्टी थी, नज़र में धूल जिगर में लिए ग़ुबार चले| गुलज़ार

  • 7th Aug 2023

    पैरहन उतार चले!

    उठाए फिरते थे एहसान जिस्म का जाँ पर, चले जहाँ से तो ये पैरहन उतार चले| गुलज़ार

  • 7th Aug 2023

    रुक के बार बार चले!

    रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चले, क़रार दे के तिरे दर से बे-क़रार चले| गुलज़ार

  • 7th Aug 2023

     हरियाली के ऊपर- रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…

  • 6th Aug 2023

    आँखें झपकते रहते हैं!

    भरे हैं रात के रेज़े कुछ ऐसे आँखों में, उजाला हो तो हम आँखें झपकते रहते हैं| गुलज़ार

  • 6th Aug 2023

    ये रोटियाँ हैं ये सिक्के

    ये रोटियाँ हैं ये सिक्के हैं और दाएरे हैं, ये एक दूजे को दिन भर पकड़ते रहते हैं| गुलज़ार

  • 6th Aug 2023

    सरकते रहते हैं!

    कभी रुका नहीं कोई मक़ाम-ए-सहरा में, कि टीले पाँव-तले से सरकते रहते हैं| गुलज़ार

  • 6th Aug 2023

    मान भी लूँ !

    श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर करने के क्रम में मैं अभी अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों में शामिल श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर कर रहा हूँ और इसके अंतर्गत आज मैं चौथा सप्तक में शामिल एक कवि श्री नंदकिशोर आचार्य जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नंदकिशोर आचार्य…

  • 5th Aug 2023

    बख़िये उधड़ते रहते हैं!

    मुझे तो रोज़ कसौटी पे दर्द कसता है, कि जाँ से जिस्म के बख़िये उधड़ते रहते हैं| गुलज़ार

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