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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 29th Jun 2026

    बस एक रात मेरे हाल में!

    ज़रा तुझे भी तो एहसास-ए-हिज्र हो जानाँ,बस एक रात मेरे हाल में गुज़ार के देख| महशर आफ़रीदी

  • 29th Jun 2026

    तू अपनी आँख में डोरे!

    न पूछ मुझ से तिरे क़ुर्ब का नशा क्या है,तू अपनी आँख में डोरे मिरे ख़ुमार के देख| महशर आफ़रीदी

  • 29th Jun 2026

    ये अश्क दिल पे गिरे!

    ये अश्क दिल पे गिरे तो बहुत चमकता है,कभी ये आइना तेज़ाब से निखार के देख| महशर आफ़रीदी

  • 29th Jun 2026

    जिंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं-4

    मेरे यूट्यूब चैनल के माध्यम से प्रस्तुत है मेरे स्वर में कृष्ण बिहारी नूर जी की ग़ज़ल का अगला शेर-आईना झूठ बोलता ही नहीं आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद। ******

  • 29th Jun 2026

    हम तो हैं परदेश में!

    मेरे यूट्यूब चैनल के माध्यम से प्रस्तुत है मेरे स्वर में डॉक्टर राही मासूम रज़ा साहब का लिखा सुन्दर गीत जिसे जगजीत सिंह जी ने गाया है. रज़ा साहब प्रसिद्ध साहित्यकार थे, जिन्होंने ‘आधा गांव” जैसे प्रसिद्ध उपन्यास लिखे हैं. – हम तो हैं परदेश में, देश में निकला होगा चांद ! आशा है आपको…

  • 29th Jun 2026

    इश्क़ की इब्तिदा है ख़ामोशी!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि एवं अपनी ग़ज़लों के लिए प्रसिद्ध श्री सूर्यभानु गुप्त जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| सूर्यभानु जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। आज प्रस्तुत हैं श्री सूर्यभानु गुप्त जी की यह ग़ज़ल- इश्क़ की इब्तिदा है ख़ामोशीआहटों का पता है ख़ामोशी चाँदनी है,…

  • 28th Jun 2026

    मेरी ज़मीन पे चल तेज़

    मेरी ज़मीन पे चल तेज़ तेज़ क़दमों से,फिर उस के बा’द तू जल्वे मिरे ग़ुबार के देख| महशर आफ़रीदी

  • 28th Jun 2026

    रूह से पुकार के देख!

    अना का बोझ कभी जिस्म से उतार के देख,मुझे ज़बाँ से नहीं रूह से पुकार के देख| महशर आफ़रीदी

  • 28th Jun 2026

    जिंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं-3

    मेरे यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज प्रस्तुत है मेरे स्वर में कृष्ण बिहारी नूर जी की ग़ज़ल का एक और शेर ‘सच बढ़े या घटे तो सच ना रहे, झूठ की कोई इंतेहा ही नहीं’ आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद । ******

  • 28th Jun 2026

    कहीं जो शहर में निकलूँ!

    मिरे जुनून को सहरा ही झेल सकता है, कहीं जो शहर में निकलूँ तो क़त्ल-ए-आम करूँ| महशर आफ़रीदी

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