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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 16th Aug 2023

    हम-सफ़र हो जाएगी!

    पाँव पत्थर करके छोड़ेगी अगर रुक जाइए, चलते रहिए तो ज़मीं भी हम-सफ़र हो जाएगी| राहत इंदौरी

  • 16th Aug 2023

    दर-ब-दर हो जाएगी!

    ज़िंदगी की हर कहानी बे-असर हो जाएगी, हम न होंगे तो ये दुनिया दर-ब-दर हो जाएगी| राहत इंदौरी

  • 16th Aug 2023

    उदास मैं!

    आज एक बार फिर से मैं साहित्य की लगभग सभी विधाओं में योगदान करने वाले प्रमुख साहित्यकार, कवि और धर्मयुग पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भारती जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती…

  • 15th Aug 2023

    क़िस्सा पुराना चाहता है

    तक़ाज़ा वक़्त का कुछ भी हो ये दिल, वही क़िस्सा पुराना चाहता है|   वसीम बरेलवी

  • 15th Aug 2023

    शिकायत का धुआँ!

    शिकायत का धुआँ आँखों से दिल तक, तअ’ल्लुक़ टूट जाना चाहता है| वसीम बरेलवी

  • 15th Aug 2023

    सर झुकाना चाहता है!

    क़लम करना कहाँ है उसका मंशा, वो मेरा सर झुकाना चाहता है| वसीम बरेलवी

  • 15th Aug 2023

    सारा ज़माना चाहता है!

    मुझे देखो कि मैं उसको ही चाहूँ, जिसे सारा ज़माना चाहता है| वसीम बरेलवी

  • 15th Aug 2023

    क्या बताना चाहता है!

    वो मुझको क्या बताना चाहता है, जो दुनिया से छुपाना चाहता है| वसीम बरेलवी

  • 15th Aug 2023

    सौंदर्य-बोध!

    आज एक बार फिर से मैं साहित्य की लगभग सभी विधाओं में योगदान करने वाले प्रमुख साहित्यकार एवं कवि श्री रामदरश मिश्र  जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र  जी की यह कविता – सौंदर्य-बोधमानव-मन…

  • 14th Aug 2023

    तुम भी संगसार न हो!

    गुनाहगारों पे उँगली उठाए देते हो, ‘वसीम’ आज कहीं तुम भी संगसार न हो| वसीम बरेलवी

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