-
मर जाने की जल्दी थी!
वो शाख़ों से जुदा होते हुए पत्तों पे हँसते थे, बड़े ज़िंदा-नज़र थे जिनको मर जाने की जल्दी थी| राहत इंदौरी
-
जाने की जल्दी थी!
मैं आख़िर कौन सा मौसम तुम्हारे नाम कर देता, यहाँ हर एक मौसम को गुज़र जाने की जल्दी थी| राहत इंदौरी
-
मगर मेरे क़बीले को!
मैं अपनी मुट्ठियों में क़ैद कर लेता ज़मीनों को, मगर मेरे क़बीले को बिखर जाने की जल्दी थी| राहत इंदौरी
-
उतर जाने की जल्दी थी
इरादा था कि मैं कुछ देर तूफ़ाँ का मज़ा लेता, मगर बेचारे दरिया को उतर जाने की जल्दी थी| राहत इंदौरी
-
घर जाने की जल्दी थी!
उसे अब के वफ़ाओं से गुज़र जाने की जल्दी थी, मगर इस बार मुझको अपने घर जाने की जल्दी थी| राहत इंदौरी
-
तल्ख़ियाँ भी लाज़मी हैं!
तल्ख़ियाँ भी लाज़मी हैं ज़िंदगी के वास्ते, इतना मीठा बन के मत रहिए शकर हो जाएगी| राहत इंदौरी
-
पनघट!
आज फिर से मैं प्रसिद्ध हिन्दी व्यंग्यकार और कवि स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| त्यागी जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की यह कविता – ग्राम अलका अप्सराएँपनघट पर नीर भरे! सुन्दर सजीले अंगअचल हिले खुले पंखवस्त्र…
-
दर्द-ए-सर हो जाएगी!
तुमने ख़ुद ही सर चढ़ाई थी सो अब चक्खो मज़ा, मैं न कहता था कि दुनिया दर्द-ए-सर हो जाएगी| राहत इंदौरी
-
साथ रहती ‘उम्र-भर!
ज़िंदगी भी काश मेरे साथ रहती ‘उम्र-भर, ख़ैर अब जैसे भी होनी है बसर हो जाएगी| राहत इंदौरी
-
तो सहर हो जाएगी!
जुगनुओं को साथ लेकर रात रौशन कीजिए, रास्ता सूरज का देखा तो सहर हो जाएगी| राहत इंदौरी