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कला!
आज एक बार फिर से मैं अपनी तरह के एक अनोखे कवि स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा बातचीत के लहज़े में बहुत सहज रूप से गहरी बात कह देते थे| भवानी दादा की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है…
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कोई चराग़ सफ़र पर!
चमक रहा है उफ़ुक़ तक ग़ुबार-ए-तीरा-शबी, कोई चराग़ सफ़र पर रवाना हो गया है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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ज़माना हो गया है!
बदन में जैसे लहू ताज़ियाना हो गया है, उसे गले से लगाए ज़माना हो गया है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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मेहराब देखने के लिए!
कहाँ है तू कि यहाँ जल रहे हैं सदियों से, चराग़ दीदा ओ मेहराब देखने के लिए| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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मेरे ही साथ डूब गया!
अजब हरीफ़ था मेरे ही साथ डूब गया, मिरे सफ़ीने को ग़र्क़ाब देखने के लिए| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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ख़्वाब देखने के लिए!
उठो ये मंज़र-ए-शब-ताब देखने के लिए, कि नींद शर्त नहीं ख़्वाब देखने के लिए| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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उदारीकरण!
आज एक बार फिर से मैं श्रेष्ठ कवि श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – काट लेना पेड़ बरगद का ख़ुशी सेनाश या निर्माण कर, अधिकार तेरा…
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शर्मिंदगी बढ़ जाएगी!
बेवफ़ाई खेल का हिस्सा है जाने दे इसे, तज़्किरा उससे न कर शर्मिंदगी बढ़ जाएगी| मुनव्वर राना
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नमी बढ़ जाएगी!
आप के हँसने से ख़तरा और भी बढ़ जाएगा, इस तरह तो और आँखों की नमी बढ़ जाएगी| मुनव्वर राना
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दुश्मनी बढ़ जाएगी!
इतनी चाहत से न देखा कीजिए महफ़िल में आप, शहर वालों से हमारी दुश्मनी बढ़ जाएगी| मुनव्वर राना