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निकल आते हैं आँसू!
न जानी क़द्र तेरी उम्र-ए-रफ़्ता हम ने कॉलेज में, निकल आते हैं आँसू अब तुझे जब याद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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बाँसुरी: मोरपाँख!
अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों के कवियों की कविताएं और उसमें से चौथा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं श्री नन्दकिशोर आचार्य जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कविताएं शायद मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नन्दकिशोर आचार्य जी की यह…
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ज़ेवर है जवानी का!
अदब ता‘लीम का जौहर है ज़ेवर है जवानी का, वही शागिर्द हैं जो ख़िदमत-ए-उस्ताद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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हमेशा भूलते जाते हैं!
सबक़ उम्र-ए-रवाँ का दिल-नशीं होने नहीं पाता, हमेशा भूलते जाते हैं जो कुछ याद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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सहर का वक़्त है!
नज़र आती है दुनिया इक इबादत-गाह-ए-नूरानी, सहर का वक़्त है बंदे ख़ुदा को याद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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ज़बाँ से याद करते हैं!
जनाब-ए-शैख़ को ये मश्क़ है याद-ए-इलाही की, ख़बर होती नहीं दिल को ज़बाँ से याद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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फ़रियाद करते हैं!
दिल-ए-नाशाद रोता है ज़बाँ उफ़ कर नहीं सकती, कोई सुनता नहीं यूँ बे-नवा फ़रियाद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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थके-माँदे मुसाफ़िर!
थके-माँदे मुसाफ़िर ज़ुल्मत-ए-शाम-ए-ग़रीबाँ में, बहार-ए-जल्वा-ए-सुब्ह-ए-वतन को याद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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तुम्हें याद करूँगा!
अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों के कवियों की कविताएं और उसमें से चौथा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय स्वदेश भारती जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी शायद एक ही रचना मैंने पहले शेयर की है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय स्वदेश भारती जी की…
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ये तारे रौशनी अपनी!
नहीं घटती मिरी आँखों में तारीकी शब-ए-ग़म की, ये तारे रौशनी अपनी अबस बरबाद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण