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सारे दिन पढ़ते अख़बार!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर श्री माहेश्वर तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| श्री तिवारी जी के कुछ नवगीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं| लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ श्री माहेश्वर तिवारी जी का यह नवगीत – सारे दिन पढ़ते अख़बार;बीत गया है…
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हज़ारों कारवाँ होंगे!
न हम होंगे न तुम होगे न दिल होगा मगर फिर भी, हज़ारों मंज़िलें होंगी हज़ारों कारवाँ होंगे| मजरूह सुल्तानपुरी
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नज़ारे फिर जवाँ होंगे!
इसी अंदाज़ से झूमेगा मौसम गाएगी दुनिया, मोहब्बत फिर हसीं होगी नज़ारे फिर जवाँ होंगे| मजरूह सुल्तानपुरी
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न जाने हम कहाँ होंगे!
हमारे बा‘द अब महफ़िल में अफ़्साने बयाँ होंगे, बहारें हम को ढूँढेगी न जाने हम कहाँ होंगे| मजरूह सुल्तानपुरी
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अब कारवाँ कोई न हो!
उल्फ़त का बदला मिल गया वो ग़म लुटा वो दिल गया, चलना है सब से दूर दूर अब कारवाँ कोई न हो| मजरूह सुल्तानपुरी
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मेरा निशाँ कोई न हो!
जा कर कहीं खो जाऊँ मैं नींद आए और सो जाऊँ मैं, दुनिया मुझे ढूँडे मगर मेरा निशाँ कोई न हो| मजरूह सुल्तानपुरी
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ना-मेहरबाँ कोई न हो!
ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो, अपना पराया मेहरबाँ ना-मेहरबाँ कोई न हो| मजरूह सुल्तानपुरी