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क्या बुरा था मरना!
कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है,मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता। मिर्ज़ा ग़ालिब
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गुनाह का गीत!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ साहित्यकार एवं संपादक स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। भारती जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की यह कविता – अगर मैंने किसी के होठ के पाटल कभी चूमेअगर मैंने किसी के…
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ये कहाँ की दोस्ती है!
ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह, कोई चारासाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता। मिर्ज़ा ग़ालिब
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कोई मेरे दिल से पूछे!
कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को,ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता। मिर्ज़ा ग़ालिब
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तिरे वा’दे पर जिए!
तिरे वा’दे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना,कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए’तिबार होता। मिर्ज़ा ग़ालिब
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सबरस जी के दुमदार दोहे!
आज मैंअपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से एक कवि श्री सबरस जी के कुछ ‘दुमदार दोहे’ जो मैंने बहुत पहले कवि सम्मेलन में सुने थे, (मुझे उनका पूरा नाम भी याद नहीं है) जैसे ये हास्य के दोहे मुझे याद हैं, मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ, मेरा उद्देश्य केवल उनकी इस रचना को जनता तक…
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यही इंतिज़ार होता!
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता,अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता। मिर्ज़ा ग़ालिब
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सात दिन हम पे भी !
ता-क़यामत शब-ए-फ़ुर्क़त में गुज़र जाएगी उम्र,सात दिन हम पे भी भारी हैं सहर होने तक। मिर्ज़ा ग़ालिब
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हमने कब मौसम का!
आज फिर से मेरा एक पुराना गीत प्रस्तुत है, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- हमने कब मौसम का वायलिन बजाया है।हम सदा जिए झुककर, सामने हवाओं के,उल्टे ऋतुचक्रों, आकाशी घटनाओं के,अपना यह हीनभाव, साथ सदा आया है। छंद जो मिला हमको, गाने कोघायल होंठों पर तैराने को,शापित अस्तित्व और घुन खाए सपने ले,मीन-मेख क्या करते-गाना…
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शम्अ हर रंग में!
ग़म-ए-हस्ती का ‘असद‘ किस से हो जुज़ मर्ग इलाज शम्अ हर रंग में जलती है सहर होने तक। मिर्ज़ा ग़ालिब