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कोई भी शक्ल मिरे!
कोई भी शक्ल मिरे दिल में उतर सकती है,इक रिफ़ाक़त में कहाँ उम्र गुज़र सकती है| अज़हर फ़राग़
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जब तक माथा चूम के!
जब तक माथा चूम के रुख़्सत करने वाली ज़िंदा थी,दरवाज़े के बाहर तक भी मुँह में लुक़्मा होता था| अज़हर फ़राग़
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एक थैला, दो शिकन, हम तीन!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक श्रेष्ठ नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ- एक थैला, दो शिकन, हम तीनडूबते सूरज तुझे आमीन! आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद।
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सपना पूरा होता था!
शुक्र करो तुम इस बस्ती में भी स्कूल खुला वर्ना,मर जाने के बा’द किसी का सपना पूरा होता था| अज़हर फ़राग़
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कठोर हुई ज़िंदगी!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री सोम ठाकुर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।सोम जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत- हमने तो जन्म से पहाड़ जिएऔर भी कठोर हुई ज़िंदगीदृष्टि खंड -खंड टूटने लगीकुहरे की भोर…
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कमरा गीला होता था!
कभी कभी आती थी पहले वस्ल की लज़्ज़त अंदर तक, बारिश तिरछी पड़ती थी तो कमरा गीला होता था| अज़हर फ़राग़
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सिर्फ़ भरोसा होता था!
दीवारें छोटी होती थीं लेकिन पर्दा होता था,ताले की ईजाद से पहले सिर्फ़ भरोसा होता था| अज़हर फ़राग़