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आँगन में दीवार चुनी!
धूप और छाँव बाँट के तुम ने आँगन में दीवार चुनी, क्या इतना आसान है ज़िंदा रहना इस आसाइश पर| गुलज़ार
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कोई एक रिहाइश पर!
दिल का हुज्रा कितनी बार उजड़ा भी और बसाया भी, सारी उम्र कहाँ ठहरा है कोई एक रिहाइश पर| गुलज़ार
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काग़ज़ का इक चाँद!
काग़ज़ का इक चाँद लगा कर रात अँधेरी खिड़की पर, दिल में कितने ख़ुश थे अपनी फ़ुर्क़त की आराइश पर| गुलज़ार
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करवट की गुंजाइश पर
मुँह मोड़ा और देखा कितनी दूर खड़े थे हम दोनों, आप लड़े थे हम से बस इक करवट की गुंजाइश पर| गुलज़ार
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रिश्तों की पैमाइश पर!
फ़ासले हैं भी और नहीं भी नापा तौला कुछ भी नहीं, लोग ब-ज़िद रहते हैं फिर भी रिश्तों की पैमाइश पर| गुलज़ार
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सैली सी ख़ामोशी में!
ओस पड़ी थी रात बहुत और कोहरा था गर्माइश पर, सैली सी ख़ामोशी में आवाज़ सुनी फ़रमाइश पर| गुलज़ार
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लक्ष्य वेध!
अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय प्रयाग नारायण त्रिपाठी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय प्रयाग नारायण त्रिपाठी जी की यह कविता – आँखें लीं मींचऔर खींच ली…
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आवाज़ भी दोहराते हुए
सी लिए होंट वो पाकीज़ा निगाहें सुनकर, मैली हो जाती है आवाज़ भी दोहराते हुए| गुलज़ार
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आवाज़ ही दे लेते!
हसरतें अपनी बिलखतीं न यतीमों की तरह, हम को आवाज़ ही दे लेते ज़रा जाते हुए| गुलज़ार
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शोख़ पत्ते ने कहा!
मैं न हूँगा तो ख़िज़ाँ कैसे कटेगी तेरी, शोख़ पत्ते ने कहा शाख़ से मुरझाते हुए| गुलज़ार