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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 24th Sep 2024

    मैं उस मकान में!

    मैं उस मकान में रहता हूँ और ज़िंदा हूँ,‘वसीम’ जिस में हवा का गुज़र नहीं होता| वसीम बरेलवी

  • 24th Sep 2024

    हमारी आँख के आँसू!

    हमारी आँख के आँसू की अपनी दुनिया है,किसी फ़क़ीर को शाहों का डर नहीं होता| वसीम बरेलवी

  • 24th Sep 2024

    मैं इक सदा हूँ!

    मुझे तलाश करोगे तो फिर न पाओगे,मैं इक सदा हूँ सदाओं का घर नहीं होता| वसीम बरेलवी

  • 24th Sep 2024

    आँसू न बन सका वर्ना!

    मैं उस की आँख का आँसू न बन सका वर्ना,मुझे भी ख़ाक में मिलने का डर नहीं होता| वसीम बरेलवी

  • 24th Sep 2024

    कभी लहू से भी!

    कभी लहू से भी तारीख़ लिखनी पड़ती है,हर एक मा’रका बातों से सर नहीं होता| वसीम बरेलवी

  • 24th Sep 2024

    हर आदमी के मुक़द्दर!

    सभी का धूप से बचने को सर नहीं होता,हर आदमी के मुक़द्दर में घर नहीं होता| वसीम बरेलवी

  • 24th Sep 2024

    यह समय झरता हुआ!

    आज मैं श्रेष्ठ हिन्दी नवगीतकार स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| ओम प्रभाकर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का यह नवगीत –  उफ़, यह समयझरता हुआ। कल के बेडौल हाथोंहुए ख़ुद से त्रस्त। कहीं कोई हैकि हममें…

  • 23rd Sep 2024

    अदब नहीं है ये!

    अदब नहीं है ये अख़बार के तराशे हैं,गए ज़मानों की कोई किताब दे जाओ| बशीर बद्र

  • 23rd Sep 2024

    मैं ज़र्द पत्तों पे शबनम!

    मैं ज़र्द पत्तों पे शबनम सजा के लाया हूँ,किसी ने मुझ से कहा था हिसाब दे जाओ| बशीर बद्र

  • 23rd Sep 2024

    फ़क़ीर कब से खड़ा!

    बहुत से और भी घर हैं ख़ुदा की बस्ती में,फ़क़ीर कब से खड़ा है जवाब दे जाओ| बशीर बद्र

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