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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 22nd Nov 2025

    जाने किस हाल में!

    आरज़ूओं के बहुत ख़्वाब तो देखो हो ‘वसीम‘, जाने किस हाल में बे-दर्द ज़माना रक्खे| वसीम बरेलवी

  • 22nd Nov 2025

    आ ग़म-ए-दोस्त!

    आ ग़म-ए-दोस्त उसी मोड़ पे हो जाऊँ जुदा,जो मुझे मेरा ही रहने दे न तेरा रक्खे| वसीम बरेलवी

  • 22nd Nov 2025

    पाँव जमाने न दिए!

    ख़ुश्क मिट्टी ही ने जब पाँव जमाने न दिए,बहते दरिया से फिर उम्मीद कोई क्या रक्खे| वसीम बरेलवी

  • 22nd Nov 2025

    नक़्श अधूरा रक्खे!

    किन शिकस्तों के शब-ओ-रोज़ से गुज़रा होगा,वो मुसव्विर जो हर इक नक़्श अधूरा रक्खे| वसीम बरेलवी

  • 22nd Nov 2025

    ज़िंदगी तुझ पे अब!

    ज़िंदगी तुझ पे अब इल्ज़ाम कोई क्या रक्खे,अपना एहसास ही ऐसा है जो तन्हा रक्खे| वसीम बरेलवी

  • 22nd Nov 2025

    क्यों हमें मौत के पैगाम दिए जाते हैं!

    अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में शमीम जयपुरी जी की लिखी एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ- क्यों हमें मौत के पैगाम दिए जाते हैं, ये सज़ा कम तो नहीं है कि किए जाते हैं। आशा है आपको पसंद आएगी,धन्यवाद।

  • 22nd Nov 2025

    वो मिस्रा-ए-आवारा!

    वो मिस्रा-ए-आवारा दीवानों पे भारी है,जिस में तिरे गेसू की बे-रब्त कहानी है| बशीर बद्र

  • 22nd Nov 2025

    वो हुस्न जिसे हमने!

    वो हुस्न जिसे हम ने रुस्वा किया दुनिया में,नादीदा हक़ीक़त है ना-गुफ़्ता कहानी है| बशीर बद्र

  • 22nd Nov 2025

    बारिश में घर लौटा कोई!

    आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय कैलाश गौतम जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कैलाश गौतम जी का यह नवगीत- बारिश में घर लौटा कोई      दर्पण देख रहा      न्यूटन जैसे पृथ्वी का      आकर्षण देख रहा ।धान-पान-सी आदमकदहरियाली लिपटी है,हाथों…

  • 21st Nov 2025

    क्या जान गँवानी है!

    इस हौसला-ए-दिल पर हम ने भी कफ़न पहना,हँस कर कोई पूछेगा क्या जान गँवानी है| बशीर बद्र

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