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मातृ वंदना
आज मैं छायावाद युग के एक और प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की एक प्रसिद्ध रचना शेयर कर रहा हूँ| निराला जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की यह रचना – नर जीवन के स्वार्थ सकलबलि हों तेरे चरणों पर,…
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रोते हुए मर जाना है!
मैं वो मेले में भटकता हुआ इक बच्चा हूँ, जिस के माँ बाप को रोते हुए मर जाना है| मुनव्वर राना
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लौट के घर जाना है!
घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें, मुझ को मत रोक मुझे लौट के घर जाना है| मुनव्वर राना
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ज़िंदगी बाँध ले सामान!
मुझ को गहराई में मिट्टी की उतर जाना है, ज़िंदगी बाँध ले सामान-ए-सफ़र जाना है| मुनव्वर राना
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हम ने ख़ैरात भी!
बादशाहों से भी फेंके हुए सिक्के न लिए, हम ने ख़ैरात भी माँगी है तो ख़ुद्दारी से| राहत इंदौरी
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चलिए मिल आते हैं!
शाहज़ादे से मुलाक़ात तो ना-मुम्किन है, चलिए मिल आते हैं चल कर किसी दरबारी से| राहत इंदौरी
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एक ख़ुश्बू सी!
ज़ेहन में जब भी तिरे ख़त की इबारत चमकी, एक ख़ुश्बू सी निकलने लगी अलमारी से| राहत इंदौरी
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आँसू – पृष्ठ २
आज मैं छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी के प्रसिद्ध काव्य ‘आँसू’ का एक अंश शेयर कर रहा हूँ| प्रसाद जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की यह रचना – घन में सुंदर बिजली-सीबिजली में चपल चमक सीआँखो में…
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अपनी हर साँस को!
अपनी हर साँस को नीलाम किया है मैं ने, लोग आसान हुए हैं बड़ी दुश्वारी से| राहत इंदौरी
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शोलों से चिंगारी से!
जा के ये कह दे कोई शोलों से चिंगारी से, फूल इस बार खिले हैं बड़ी तय्यारी से| राहत इंदौरी