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ढूँढ रहा हूँ तुझ में!
पास इतना कि तिरी साँस से टकराती है साँस, दूर इतना कि तुझे ढूँढ रहा हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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क्या देख रहा हूँ तुझ में!
तेरे चेहरे से हटाई नहीं जातीं नज़रें, क्या ख़बर देर से क्या देख रहा हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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भूल गया हूँ तुझ में!
तुझ से बिछड़े तो ज़माना हुआ लेकिन अब तक, याद आता है कि कुछ भूल गया हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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देख चुका हूँ तुझ में!
मेरा दावा है कि तू ने भी न देखे होंगे, ऐसे जल्वे कि जो मैं देख चुका हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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डूब गया हूँ तुझ में!
तू वो दरिया है कि जिस का कोई साहिल ही नहीं, मैं सफ़ीने की तरह डूब गया हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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मैं तो इक फूल की!
तू ने अब तक मुझे काँटों के सिवा कुछ न दिया, मैं तो इक फूल की मानिंद खिला हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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क्या देख रहा हूँ तुझ में!
बा-वफ़ाई की अदा पाने लगा हूँ तुझ में, ऐ जफ़ा-दोस्त ये क्या देख रहा हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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चेहरे !
आज एक बार फिर मैं विख्यात हिन्दी साहित्यकार एवं श्रेष्ठ कवि श्री रामदरश मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह रचना – आपके संगमरमरी मकान का दरवाज़ापारदर्शी शीशे का हैउसमें से…
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नज़्मों के उनवानों पर!
शेर तो उन पर लिक्खे लेकिन औरों से मंसूब किए, उन को क्या क्या ग़ुस्सा आया नज़्मों के उनवानों पर| जाँ निसार अख़्तर
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जब भी उस के पाँव!
और भी सीना कसने लगता और कमर बल खा जाती, जब भी उस के पाँव फिसलने लगते थे ढलवानों पर| जाँ निसार अख़्तर