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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 24th Mar 2024

    ढूँढ रहा हूँ तुझ में!

    पास इतना कि तिरी साँस से टकराती है साँस, दूर इतना कि तुझे ढूँढ रहा हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी

  • 24th Mar 2024

    क्या देख रहा हूँ तुझ में!

    तेरे चेहरे से हटाई नहीं जातीं नज़रें, क्या ख़बर देर से क्या देख रहा हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी

  • 24th Mar 2024

    भूल गया हूँ तुझ में!

    तुझ से बिछड़े तो ज़माना हुआ लेकिन अब तक, याद आता है कि कुछ भूल गया हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी

  • 24th Mar 2024

    देख चुका हूँ तुझ में!

    मेरा दावा है कि तू ने भी न देखे होंगे, ऐसे जल्वे कि जो मैं देख चुका हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी

  • 24th Mar 2024

    डूब गया हूँ तुझ में!

    तू वो दरिया है कि जिस का कोई साहिल ही नहीं, मैं सफ़ीने की तरह डूब गया हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी

  • 24th Mar 2024

    मैं तो इक फूल की!

    तू ने अब तक मुझे काँटों के सिवा कुछ न दिया, मैं तो इक फूल की मानिंद खिला हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी

  • 24th Mar 2024

    क्या देख रहा हूँ तुझ में!

    बा-वफ़ाई की अदा पाने लगा हूँ तुझ में, ऐ जफ़ा-दोस्त ये क्या देख रहा हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी

  • 24th Mar 2024

    चेहरे !

    आज एक बार फिर मैं विख्यात हिन्दी साहित्यकार एवं श्रेष्ठ कवि श्री रामदरश मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह रचना – आपके संगमरमरी मकान का दरवाज़ापारदर्शी शीशे का हैउसमें से…

  • 23rd Mar 2024

    नज़्मों के उनवानों पर!

    शेर तो उन पर लिक्खे लेकिन औरों से मंसूब किए, उन को क्या क्या ग़ुस्सा आया नज़्मों के उनवानों पर| जाँ निसार अख़्तर

  • 23rd Mar 2024

    जब भी उस के पाँव!

    और भी सीना कसने लगता और कमर बल खा जाती, जब भी उस के पाँव फिसलने लगते थे ढलवानों पर| जाँ निसार अख़्तर

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