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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th Oct 2024

    उड़ता है अश्क!

    हंगाम-ए-गिर्या आह से नादाँ ‘असर’ हज़र,उड़ता है अश्क जैसे शरारा कभी कभी| असर लखनवी

  • 7th Oct 2024

    तेरी नज़र से तेरा!

    ऐ शाहिद-ए-जमाल कोई शक्ल है कि हो,तेरी नज़र से तेरा नज़ारा कभी कभी| असर लखनवी

  • 7th Oct 2024

    क़तरे से एक मौज!

    क़तरे से एक मौज ये कहती निकल गई,साहिल से मस्लहत है किनारा कभी कभी| असर लखनवी

  • 7th Oct 2024

    दिल को हो काश!

    रुस्वाइयों से दूर नहीं बे-क़रारियाँदिल को हो काश सब्र का यारा कभी कभी असर लखनवी

  • 7th Oct 2024

    दिल को क्या करूँ!

    मैं ने तो होंट सी लिए इस दिल को क्या करूँबे-इख़्तियार तुम को पुकारा कभी कभी असर लखनवी

  • 7th Oct 2024

    सितारा कभी कभी!

    हर-चंद अश्क-ए-यास जब उमडे तो पी गएचमका फ़लक पे एक सितारा कभी कभी असर लखनवी

  • 7th Oct 2024

    विनय!

    आज एक बार मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि और छायावाद युग के एक स्तंभ स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| पंत जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की यह कविता – मा! मेरे जीवन की हारतेरा मंजुल हृदय-हार हो,अश्रु-कणों…

  • 6th Oct 2024

    दिल डूबने लगा तो!

    चुपके से नाम ले के तुम्हारा कभी कभीदिल डूबने लगा तो उभारा कभी कभी असर लखनवी

  • 6th Oct 2024

    सिलसिला टूटा नहीं है!

    जिस को भी चाहा उसे शिद्दत से चाहा है ‘फ़राज़’सिलसिला टूटा नहीं है दर्द की ज़ंजीर का अहमद फ़राज़

  • 6th Oct 2024

    इश्क़ में सर फोड़ना!

    इश्क़ में सर फोड़ना भी क्या कि ये बे-मेहर लोग,जू*-ए-ख़ूँ को नाम दे देते हैं जू-ए-शीर का| *River अहमद फ़राज़

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