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अब सरों की बारी है!
कुछ तो पाएँगे उस की क़ुर्बतों का ख़म्याज़ा, दिल तो हो चुके टुकड़े अब सरों की बारी है| मंज़र भोपाली
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बात बात प्यारी है!
इक अजीब ठंडक है इस के नर्म लहजे में, लफ़्ज़ लफ़्ज़ शबनम है बात बात प्यारी है| मंज़र भोपाली
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मेरे ही बुज़ुर्गों ने!
मेरे ही बुज़ुर्गों ने सर-बुलंदियाँ बख़्शीं, मेरे ही क़िबले पर मश्क़-ए-संग-बारी है| मंज़र भोपाली
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ज़ेहन ज़ेहन तारी है!
हाल ख़ूँ में डूबा है कल न जाने क्या होगा, अब ये ख़ौफ़-ए-मुस्तक़बिल ज़ेहन ज़ेहन तारी है| मंज़र भोपाली
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अब के फिर हवाओं में!
मोड़ लेने वाली है, ज़िंदगी कोई शायद, अब के फिर हवाओं में एक बे-क़रारी है| मंज़र भोपाली
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दोस्त भी शिकारी हैं!
ग़म-गुसार चेहरों पर ए‘तिबार मत करना, शहर में सियासत के दोस्त भी शिकारी हैं| मंज़र भोपाली
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प्राण लिपिक से!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ गीतकार और मेरे लिए गुरु तुल्य रहे स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत – दुनिया के “ऑफिस” में अब तोबैठे…
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छाँव भी हमारी है!
ज़ुल्फ़ ओ रुख़ के साए में ज़िंदगी गुज़ारी है, धूप भी हमारी है छाँव भी हमारी है| मंज़र भोपाली
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राह में हाइल हो जाओ!
मैं हूँ या मौज-ए-फ़ना और यहाँ कोई नहीं, तुम अगर हो तो ज़रा राह में हाइल* हो जाओ| *सामने आ जाओ इरफ़ान सिद्दीक़ी
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रूह में लग जाए!
अभी पैकर ही जला है तो ये आलम है मियाँ, आग ये रूह में लग जाए तो कामिल हो जाओ| इरफ़ान सिद्दीक़ी