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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 12th Apr 2024

    तिरी महफ़िलों में हूँ!

    बदला न मेरे बाद भी मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू, मैं जा चुका हूँ फिर भी तिरी महफ़िलों में हूँ| अहमद फ़राज़

  • 12th Apr 2024

    इन्ही क़ाफ़िलों में हूँ!

    तू लूट कर भी अहल-ए-तमन्ना को ख़ुश नहीं, याँ लुट के भी वफ़ा के इन्ही क़ाफ़िलों में हूँ| अहमद फ़राज़

  • 12th Apr 2024

    कब से उदासियों के!

    ऐ यार-ए-ख़ुश-दयार तुझे क्या ख़बर कि मैं, कब से उदासियों के घने जंगलों में हूँ| अहमद फ़राज़

  • 12th Apr 2024

    मैं संग-ए-राह हूँ!

    मुझ से गुरेज़-पा है तो हर रास्ता बदल, मैं संग-ए-राह हूँ तो सभी रास्तों में हूँ| अहमद फ़राज़

  • 12th Apr 2024

    तिरे दोस्तों में हूँ!

    तेरे क़रीब आ के बड़ी उलझनों में हूँ, मैं दुश्मनों में हूँ कि तिरे दोस्तों में हूँ| अहमद फ़राज़

  • 12th Apr 2024

    बताइए अब क्या करना है!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के विख्यात व्यंग्य काव्य लेखक और कुशल मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| चक्रधर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता – कि बौड़म जी ने एक ही…

  • 11th Apr 2024

    दीदा ओ दिल को!

    दीदा ओ दिल को सँभालो कि सर-ए-शाम-ए-फ़िराक़, साज़-ओ-सामान बहम पहुँचा है रुस्वाई का|     फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 11th Apr 2024

    इक़रार मसीहाई का!

    एक बार और मसीहा-ए-दिल-ए-दिल-ज़दगाँ, कोई वा‘दा कोई इक़रार मसीहाई का| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 11th Apr 2024

    तिरी रानाई का!

    सेहन-ए-गुलशन में कभी ऐ शह-ए-शमशाद-क़दाँ, फिर नज़र आए सलीक़ा तिरी रानाई का| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 11th Apr 2024

    अंजुमन-ए-गुल-बदनाँ

    गर्मी-ए-रश्क से हर अंजुमन-ए-गुल-बदनाँ, तज़्किरा छेड़े तिरी पैरहन-आराई का| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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