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इस मोड़ से तुम मुड़ गई!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक प्रमुख कवि तथा आपातकाल में लिखी गई ग़ज़लों के संग्रह ‘साए में धूप’ के माध्यम से विशेष ख्याति प्राप्त करने वाले स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है…
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इंसान का अगर!
इंसान का अगर क़द-ओ-क़ामत न बढ़ सके, तुम इस को नक़्स-ए-आब-ओ-हवा कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
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घटा कह लिया करो!
यारो ये दौर ज़ोफ़-ए-बसारत का दौर है, आँधी उठे तो उस को घटा कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
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ख़ुदा कह लिया करो!
गर चाहते हो ख़ुश रहें कुछ बंदगान-ए-ख़ास, जितने सनम हैं उन को ख़ुदा कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
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हर संग-दिल को!
ख़ुद को फ़रेब दो कि न हो तल्ख़ ज़िंदगी, हर संग-दिल को जान-ए-वफ़ा कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
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सदा कह लिया करो!
हर बे-ज़बाँ को शोला-नवा कह लिया करो, यारो सुकूत* ही को सदा कह लिया करो| *खामोशी क़तील शिफ़ाई
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अपने तमाशाइयों में हूँ!
ख़ुद ही मिसाल-ए-लाला-ए-सेहरा लहू लहू, और ख़ुद ‘फ़राज़’ अपने तमाशाइयों में हूँ| अहमद फ़राज़
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उसका जन्मदिन!
आज एक बार फिर मैं आधुनिक हिन्दी कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| वाजपेयी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता – आज उसका जन्मदिन हैजन्मदिन है असंख्य किसलयों काजो फैलाते हैं उल्लास और ताज़गी…
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तिरे क़हक़हों में हूँ!
तू हँस रहा है मुझ पे मिरा हाल देख कर, और फिर भी मैं शरीक तिरे क़हक़हों में हूँ| अहमद फ़राज़
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तिरी ख़्वाहिशों में हूँ!
मुझ से बिछड़ के तू भी तो रोएगा उम्र भर, ये सोच ले कि मैं भी तिरी ख़्वाहिशों में हूँ| अहमद फ़राज़