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डरा देना चाहिए!
इक तेज़ रअ‘द* जैसी सदा हर मकान में, लोगों को उन के घर में डरा देना चाहिए| *बादलों के गरजने की आवाज़ मुनीर नियाज़ी
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मिलती नहीं पनाह हमें!
मिलती नहीं पनाह हमें जिस ज़मीन पर, इक हश्र उस ज़मीं पे उठा देना चाहिए| मुनीर नियाज़ी
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जला देना चाहिए!
इस शहर-ए-संग-दिल को जला देना चाहिए, फिर उस की ख़ाक को भी उड़ा देना चाहिए| मुनीर नियाज़ी
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शब भर बे-आराम हुए!
‘इंशा’-साहिब पौ फटती है तारे डूबे सुब्ह हुई, बात तुम्हारी मान के हम तो शब भर बे-आराम हुए| इब्न-ए-इंशा
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जी को दुखाना क्या!
उन से बहार ओ बाग़ की बातें कर के जी को दुखाना क्या, जिन को एक ज़माना गुज़रा कुंज-ए-क़फ़स में राम हुए| इब्न-ए-इंशा
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मिरगी पड़ी!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं पर अपनी अमिट छाप डालने वाले स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की यह कविता – अच्छा…
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चाह की राह दिखाकर!
शौक़ की आग नफ़स की गर्मी घटते घटते सर्द न हो, चाह की राह दिखा कर तुम तो वक़्फ़-ए-दरीचा-ओ-बाम हुए| इब्न-ए-इंशा
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एक हमीं बदनाम हुए!
एक से एक जुनूँ का मारा इस बस्ती में रहता है, एक हमीं हुशियार थे यारो एक हमीं बद-नाम हुए| इब्न-ए-इंशा
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किस सूरज से माँगें धूप
किस का चमकता चेहरा लाएँ किस सूरज से माँगें धूप, घूर अँधेरा छा जाता है ख़ल्वत-ए-दिल में शाम हुए| इब्न-ए-इंशा
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ख़ार हुए नाकाम हुए!
उन लोगों की बात करो जो इश्क़ में ख़ुश-अंजाम हुए, नज्द में क़ैस यहाँ पर ‘इंशा’ ख़ार हुए नाकाम हुए| इब्न-ए-इंशा