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दर्द सोया भी नहीं था!
वो सितम-केश बहर-हाल सितम-केश रहे,दर्द सोया भी नहीं था कि जगाने निकले| रज़ा अमरोहवी
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यादों के ख़ज़ाने!
जिन किताबों पे सलीक़े से जमी वक़्त की गर्द,उन किताबों ही में यादों के ख़ज़ाने निकले| रज़ा अमरोहवी
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उन्हें घर मुबारक हमें अपनी आहें!
आज फिर से एक पुरानी पोस्ट शेयर कर रहा हूँ| काफी दिन से मैंने अपने प्रिय गायक मुकेश जी का कोई गीत शेयर नहीं किया था, आज कर लेता हूँ| जी हाँ ये गीत है 1958 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘परवरिश’ का, गीत लिखा है- हसरत जयपुरी जी ने और इसका संगीत दिया है- दत्ताराम…
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सर-फिरे शहर!
देखना ये है ठहरता है कहाँ जोश-ए-जुनूँ,सर-फिरे शहर-ए-निगाराँ को जलाने निकले| रज़ा अमरोहवी
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ख़्वाब तो ख़्वाब थे!
ख़्वाब तो ख़्वाब थे आँखों में कहाँ रुक जाते,वो दबे पाँव उन्हें भी तो चुराने निकले| रज़ा अमरोहवी
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छोड़ कर वहम!
छोड़ कर वहम-ओ-गुमाँ हुस्न-ए-यकीं तक पहुँचो,पर यक़ीं से भी कभी वहम-ओ-गुमाँ तक आओ| अली सरदार जाफ़री
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लो वो सदियों के!
लो वो सदियों के जहन्नुम की हदें ख़त्म हुई,अब है फ़िर्दौस ही फ़िर्दौस जहाँ तक आओ| अली सरदार जाफ़री