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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 29th Oct 2024

    दर्द सोया भी नहीं था!

    वो सितम-केश बहर-हाल सितम-केश रहे,दर्द सोया भी नहीं था कि जगाने निकले| रज़ा अमरोहवी

  • 29th Oct 2024

    यादों के ख़ज़ाने!

    जिन किताबों पे सलीक़े से जमी वक़्त की गर्द,उन किताबों ही में यादों के ख़ज़ाने निकले| रज़ा अमरोहवी

  • 29th Oct 2024

    सरफ़रोशी के यहाँ!

    कारोबार-ए-रसन-ओ-दार की तशहीर हुई,सरफ़रोशी के यहाँ कितने बहाने निकले| रज़ा अमरोहवी

  • 29th Oct 2024

    उन्हें घर मुबारक हमें अपनी आहें!

    आज फिर से एक पुरानी पोस्ट शेयर कर रहा हूँ| काफी दिन से मैंने अपने प्रिय गायक मुकेश जी का कोई गीत शेयर नहीं किया था, आज कर लेता हूँ| जी हाँ ये गीत है 1958 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘परवरिश’ का, गीत लिखा है- हसरत जयपुरी जी ने और इसका संगीत दिया है- दत्ताराम…

  • 28th Oct 2024

    बे-गुनाही की सनद!

    अपने घर संग-ए-मलामत की हुई है बारिश,बे-गुनाही की सनद हम जो दिखाने निकले| रज़ा अमरोहवी

  • 28th Oct 2024

    सर-फिरे शहर!

    देखना ये है ठहरता है कहाँ जोश-ए-जुनूँ,सर-फिरे शहर-ए-निगाराँ को जलाने निकले| रज़ा अमरोहवी

  • 28th Oct 2024

    ख़्वाब तो ख़्वाब थे!

    ख़्वाब तो ख़्वाब थे आँखों में कहाँ रुक जाते,वो दबे पाँव उन्हें भी तो चुराने निकले| रज़ा अमरोहवी

  • 28th Oct 2024

    ज़ख़्म पुराने निकले!

    दिल में झाँका तो बहुत ज़ख़्म पुराने निकले,इक फ़साने से कई और फ़साने निकले| रज़ा अमरोहवी

  • 28th Oct 2024

    छोड़ कर वहम!

    छोड़ कर वहम-ओ-गुमाँ हुस्न-ए-यकीं तक पहुँचो,पर यक़ीं से भी कभी वहम-ओ-गुमाँ तक आओ| अली सरदार जाफ़री

  • 28th Oct 2024

    लो वो सदियों के!

    लो वो सदियों के जहन्नुम की हदें ख़त्म हुई,अब है फ़िर्दौस ही फ़िर्दौस जहाँ तक आओ| अली सरदार जाफ़री

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