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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 20th Apr 2024

    वो जो सब का बहुत चहीता था!

    वो जो सब का बहुत चहीता था, क़ब्र की साअ‘तों में तन्हा था| क़ैसर शमीम

  • 20th Apr 2024

    तेरा नज़ारा कभी कभी!

    ऐ शाहिद-ए-जमाल कोई शक्ल है की हो, तेरी नज़र से तेरा नज़ारा कभी कभी| असर लखनवी

  • 20th Apr 2024

    किनारा कभी कभी!

    क़तरे से एक मौज ये कहती निकल गई, साहिल से मस्लहत है किनारा कभी कभी| असर लखनवी

  • 20th Apr 2024

    रुस्वाइयों से दूर नहीं!

    रुस्वाइयों से दूर नहीं बे-क़रारियाँ, दिल को हो काश सब्र का यारा कभी कभी| असर लखनवी

  • 20th Apr 2024

    पतवार!

    आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि स्वर्गीय शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी की  एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुमन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी का यह गीत – तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार। आज सिन्धु ने…

  • 19th Apr 2024

    मैं ने तो होंट सी लिए!

    मैं ने तो होंट सी लिए इस दिल को क्या करूँ, बे-इख़्तियार तुम को पुकारा कभी कभी| असर लखनवी

  • 19th Apr 2024

    एक सितारा कभी कभी!

    हर-चंद अश्क-ए-यास जब उमडे तो पी गए, चमका फ़लक पे एक सितारा कभी कभी| असर लखनवी

  • 19th Apr 2024

    दिल डूबने लगा तो!

    चुपके से नाम ले के तुम्हारा कभी कभी, दिल डूबने लगा तो उभारा कभी कभी| असर लखनवी

  • 19th Apr 2024

    रूह बदन का बोझ!

    उम्र-सफ़र जारी है बस ये खेल देखने को, रूह बदन का बोझ कहाँ तक कब तक ढोती है|    शहरयार

  • 19th Apr 2024

    ख़ुद को तसल्ली देना!

    ख़ुद को तसल्ली देना कितना मुश्किल होता है, कोई क़ीमती चीज़ अचानक जब भी खोती है| शहरयार

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