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किसी का जिगर नहीं!
रखते क़दम जो वादी-ए-उल्फ़त में बे-धड़क, ‘हैरत’ सिवा तुम्हारे किसी का जिगर नहीं| हैरत इलाहाबादी
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भटकता बादल- रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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इधर हाँ उधर नहीं!
क्या कहिए इस तरह के तलव्वुन-मिज़ाज को, वादे का है ये हाल इधर हाँ उधर नहीं| हैरत इलाहाबादी
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अंधेर इस पे ये है कि!
इक तो शब-ए-फ़िराक़ के सदमे हैं जाँ-गुदाज़, अंधेर इस पे ये है कि होती सहर नहीं| हैरत इलाहाबादी
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हमें लोगों का डर नहीं!
आ जाएँ रोब-ए-ग़ैर में हम वो बशर नहीं, कुछ आप की तरह हमें लोगों का डर नहीं| हैरत इलाहाबादी
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सामान सौ बरस का है!
आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं, सामान सौ बरस का है पल की ख़बर नहीं| हैरत इलाहाबादी