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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 4th May 2024

    गँवाना भी नहीं चाहता है!

    अपने किस काम में लाएगा बताता भी नहीं, हम को औरों पे गँवाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी

  • 4th May 2024

    ख़्वाब दिखाना भी नहीं चाहता है!

    कैसे उस शख़्स से ताबीर पे इसरार करें, जो हमें ख़्वाब दिखाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी

  • 4th May 2024

    ख़ाक उड़ाना भी नहीं चाहता है!

    सैर भी जिस्म के सहरा की ख़ुश आती है मगर, देर तक ख़ाक उड़ाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी

  • 4th May 2024

    छोड़ के जाना भी नहीं चाहता है!

    जब से जाना है कि मैं जान समझता हूँ उसे, वो हिरन छोड़ के जाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी

  • 4th May 2024

    राह पे लाना भी नहीं चाहता है!

    उस को मंज़ूर नहीं है मिरी गुमराही भी, और मुझे राह पे लाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी

  • 4th May 2024

    जलाना भी नहीं चाहता है!

    शोला-ए-इश्क़ बुझाना भी नहीं चाहता है, वो मगर ख़ुद को जलाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी

  • 4th May 2024

    अगर दिलबर की रुसवाई!  

    आज काफी लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर मैं एक फिल्मी गीत के बोल  शेयर कर रहा हूँ| ये गीत खिलौना फिल्म के लिए आनंद बख्शी जी ने लिखा था, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी ने इसका संगीत दिया था और स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी ने इसको अपने मधुर स्वर में गाया था| लीजिए…

  • 3rd May 2024

    चंद उम्मीदें निचोड़ी थीं!

    चंद उम्मीदें निचोड़ी थीं तो आहें टपकीं, दिल को पिघलाएँ तो हो सकता है साँसें निकलें| गुलज़ार

  • 3rd May 2024

    शायद मिरी शाख़ें निकलें!

    दफ़्न हो जाएँ कि ज़रख़ेज़ ज़मीं लगती है, कल इसी मिट्टी से शायद मिरी शाख़ें निकलें| गुलज़ार

  • 3rd May 2024

    चाँद का छलका उतर जाए!

    वक़्त की ज़र्ब से कट जाते हैं सब के सीने, चाँद का छलका उतर जाए तो क़ाशें* निकलें| *फांक गुलज़ार

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