-
गँवाना भी नहीं चाहता है!
अपने किस काम में लाएगा बताता भी नहीं, हम को औरों पे गँवाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
-
ख़्वाब दिखाना भी नहीं चाहता है!
कैसे उस शख़्स से ताबीर पे इसरार करें, जो हमें ख़्वाब दिखाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
-
ख़ाक उड़ाना भी नहीं चाहता है!
सैर भी जिस्म के सहरा की ख़ुश आती है मगर, देर तक ख़ाक उड़ाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
-
छोड़ के जाना भी नहीं चाहता है!
जब से जाना है कि मैं जान समझता हूँ उसे, वो हिरन छोड़ के जाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
-
राह पे लाना भी नहीं चाहता है!
उस को मंज़ूर नहीं है मिरी गुमराही भी, और मुझे राह पे लाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
-
जलाना भी नहीं चाहता है!
शोला-ए-इश्क़ बुझाना भी नहीं चाहता है, वो मगर ख़ुद को जलाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
-
चंद उम्मीदें निचोड़ी थीं!
चंद उम्मीदें निचोड़ी थीं तो आहें टपकीं, दिल को पिघलाएँ तो हो सकता है साँसें निकलें| गुलज़ार
-
शायद मिरी शाख़ें निकलें!
दफ़्न हो जाएँ कि ज़रख़ेज़ ज़मीं लगती है, कल इसी मिट्टी से शायद मिरी शाख़ें निकलें| गुलज़ार
-
चाँद का छलका उतर जाए!
वक़्त की ज़र्ब से कट जाते हैं सब के सीने, चाँद का छलका उतर जाए तो क़ाशें* निकलें| *फांक गुलज़ार