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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th May 2024

    हवा काट रहा हूँ!

    अब आप की मर्ज़ी है इसे जो भी समझिए, लेकिन मैं इशारे से हवा काट रहा हूँ| मुनव्वर राना

  • 7th May 2024

    क़िस्मत का लिखा काट रहा हूँ!

    दुनिया मिरे सज्दे को इबादत न समझना, पेशानी पे क़िस्मत का लिखा काट रहा हूँ| मुनव्वर राना

  • 7th May 2024

    मैं सज़ा काट रहा हूँ!

    ये बात मुझे देर से मा‘लूम हुई है, ज़िंदाँ है ये दुनिया मैं सज़ा काट रहा हूँ| मुनव्वर राना

  • 7th May 2024

    हाथों का लिखा काट रहा हूँ!

    ख़ुद अपने ही हाथों का लिखा काट रहा हूँ, ले देख ले दुनिया मैं पता काट रहा हूँ| मुनव्वर राना

  • 7th May 2024

    देखा है कई बार!

    इस शब के मुक़द्दर में सहर ही नहीं ‘मोहसिन’, देखा है कई बार चराग़ों को बुझा कर|    मोहसिन नक़वी

  • 7th May 2024

    दुश्मन की भी पहचान कहाँ है!

    ऐ दिल तुझे दुश्मन की भी पहचान कहाँ है, तू हल्क़ा-ए-याराँ में भी मोहतात* रहा कर| *सावधान मोहसिन नक़वी

  • 7th May 2024

    माली तुम्हीं फैसला कर दो!  

    आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ कवि और सांसद तथा संसदीय राजभाषा समिति के सम्मानित सदस्य रहे श्री उदय प्रताप सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं श्री उदय प्रताप सिंह जी की यह कविता – अगर बहारें पतझड़ जैसा…

  • 6th May 2024

    वक़्त की दीवार गिरा कर!

    वो आज भी सदियों की मसाफ़त पे खड़ा है, ढूँडा था जिसे वक़्त की दीवार गिरा कर| मोहसिन नक़वी

  • 6th May 2024

    कभी रो भी लिया कर!

    हर वक़्त का हँसना तुझे बर्बाद न कर दे, तन्हाई के लम्हों में कभी रो भी लिया कर| मोहसिन नक़वी

  • 6th May 2024

    मिरे सामने आ कर!

    उस शख़्स के तुम से भी मरासिम हैं तो होंगे, वो झूट न बोलेगा मिरे सामने आ कर| मोहसिन नक़वी

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