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ख़ुद को मर जाने दिया!
कर ही क्या सकते थे हम सो उम्र भर, रफ़्ता-रफ़्ता ख़ुद को मर जाने दिया| राजेश रेड्डी
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ख़ाली-पन से भर जाने दिया!
इक ख़ला* अंदर उतर जाने दिया, ख़ुद को ख़ाली-पन से भर जाने दिया| *खालीपन राजेश रेड्डी
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होंठों तक आया कई बार!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय कुमार शिव जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय कुमार शिव जी का यह नवगीत – होंठों तक आया कई बारवाणी तक पहुँच नहीं पायावो हुआ कभी भी नहीं व्यक्त !…
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यूँ बात बात पर!
कुछ एहतिराम अपनी अना का भी ‘नूर’ कर, यूँ बात बात पर न किसी की दहाई दे| कृष्ण बिहारी नूर
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या ज़िंदगी की क़ैद से!
या ये बता कि क्या है मिरा मक़्सद-ए-हयात, या ज़िंदगी की क़ैद से मुझ को रिहाई दे| कृष्ण बिहारी नूर
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गुनहगार साँस साँस!
मुजरिम है सोच सोच गुनहगार साँस साँस, कोई सफ़ाई दे तो कहाँ तक सफ़ाई दे| कृष्ण बिहारी नूर
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ऐ काश इस मक़ाम पे!
ऐ काश इस मक़ाम पे पहुँचा दे उस का प्यार, वो कामयाब होने पे मुझ को बधाई दे| कृष्ण बिहारी नूर