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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 21st Nov 2024

    हमारा ज़िक्र भी अब!

    हमारा ज़िक्र भी अब जुर्म हो गया है वहाँ, दिनों की बात है महफ़िल की आबरू हम थे| राहत इंदौरी

  • 21st Nov 2024

    कभू कभू हम थे!

    ज़मीं पे लड़ते हुए आसमाँ के नर्ग़े में,कभी कभी कोई दुश्मन कभू कभू हम थे| राहत इंदौरी

  • 21st Nov 2024

    वो हम नहीं थे मगर!

    वो आईना तो नहीं था पर आईने सा था,वो हम नहीं थे मगर यार हू-ब-हू हम थे| राहत इंदौरी

  • 21st Nov 2024

    ख़ुदा का शुक्र कि !

    दिनों के बा’द अचानक तुम्हारा ध्यान आया,ख़ुदा का शुक्र कि उस वक़्त बा-वज़ू हम थे| राहत इंदौरी

  • 21st Nov 2024

    उठी निगाह तो!

    उठी निगाह तो अपने ही रू-ब-रू हम थे,ज़मीन आइना-ख़ाना थी चार-सू हम थे| राहत इंदौरी

  • 21st Nov 2024

    एक आत्मीय अनुरोध!

    आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि श्री नंद भारद्वाज जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| नंद जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नंद भारद्वाज जी की यह कविता – कहवाघरों की सर्द बहसों मेंअपने को खोने से बेहतर हैघर में बीमार बीबी के पास बैठो,आईने…

  • 20th Nov 2024

    जाना भी तो नहीं आया

    ‘वसीम’ देखना मुड़ मुड़ के वो उसी की तरफ़, किसी को छोड़ के जाना भी तो नहीं आया| वसीम बरेलवी

  • 20th Nov 2024

    मुझे बहाना बनाना!

    वो पूछता था मिरी आँख भीगने का सबब,मुझे बहाना बनाना भी तो नहीं आया| वसीम बरेलवी

  • 20th Nov 2024

    हमें ये शहर बसाना!

    नए मकान बनाए तो फ़ासलों की तरह,हमें ये शहर बसाना भी तो नहीं आया| वसीम बरेलवी

  • 20th Nov 2024

    तुम्हें चराग़ बुझाना भी!

    जला के रख लिया हाथों के साथ दामन तक,तुम्हें चराग़ बुझाना भी तो नहीं आया| वसीम बरेलवी

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