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दिल में सितारे उतरने लगते हैं!
दर-ए-क़फ़स पे अँधेरे की मोहर लगती है, तो ‘फ़ैज़’ दिल में सितारे उतरने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तो चश्म-ए-सुब्ह में!
सबा से करते हैं ग़ुर्बत-नसीब ज़िक्र-ए-वतन, तो चश्म-ए-सुब्ह में आँसू उभरने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तेरी गली से गुज़रने लगते हैं!
हर अजनबी हमें महरम दिखाई देता है, जो अब भी तेरी गली से गुज़रने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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गेसू सँवरने लगते हैं!
हदीस-ए-यार के उनवाँ निखरने लगते हैं, तो हर हरीम में गेसू सँवरने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तुम्हें याद करने लगते हैं!
तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं, किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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स्वप्नपट!
आज एक बार फिर मैं छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ और प्रकृति के सुकुमार कवि स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की यह कविता – ग्राम नहीं, वे ग्राम आजऔ’ नगर न…
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हम अजनबी की तरह!
ज़बाँ हमारी न समझा यहाँ कोई ‘मजरूह’, हम अजनबी की तरह अपने ही वतन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी
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लहू हिना नहीं बनता!
सरिश्क रंग न बख़्शे तो क्यूँ हो बार-ए-मिज़ा, लहू हिना नहीं बनता तो क्यूँ बदन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी
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किसी ज़ुल्फ़ की शिकन में रहे!
खुले जो हम तो किसी शोख़ की नज़र में खुले, हुए गिरह तो किसी ज़ुल्फ़ की शिकन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी
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न हम मिसाल-ए-सबा!
न हम क़फ़स में रुके मिस्ल-ए-बू-ए-गुल सय्याद, न हम मिसाल-ए-सबा हल्क़ा-ए-रसन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी