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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 16th May 2024

    दिल में सितारे उतरने लगते हैं!

    दर-ए-क़फ़स पे अँधेरे की मोहर लगती है, तो ‘फ़ैज़’ दिल में सितारे उतरने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 16th May 2024

    तो चश्म-ए-सुब्ह में!

    सबा से करते हैं ग़ुर्बत-नसीब ज़िक्र-ए-वतन, तो चश्म-ए-सुब्ह में आँसू उभरने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 16th May 2024

    तेरी गली से गुज़रने लगते हैं!

    हर अजनबी हमें महरम दिखाई देता है, जो अब भी तेरी गली से गुज़रने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 16th May 2024

    गेसू सँवरने लगते हैं!

    हदीस-ए-यार के उनवाँ निखरने लगते हैं, तो हर हरीम में गेसू सँवरने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 16th May 2024

    तुम्हें याद करने लगते हैं!

    तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं, किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 16th May 2024

    स्वप्नपट!  

    आज एक बार फिर मैं छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ और प्रकृति के सुकुमार कवि स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी  की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की यह कविता – ग्राम नहीं, वे ग्राम आजऔ’ नगर न…

  • 15th May 2024

    हम अजनबी की तरह!

    ज़बाँ हमारी न समझा यहाँ कोई ‘मजरूह’, हम अजनबी की तरह अपने ही वतन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 15th May 2024

    लहू हिना नहीं बनता!

    सरिश्क रंग न बख़्शे तो क्यूँ हो बार-ए-मिज़ा, लहू हिना नहीं बनता तो क्यूँ बदन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 15th May 2024

    किसी ज़ुल्फ़ की शिकन में रहे!

    खुले जो हम तो किसी शोख़ की नज़र में खुले, हुए गिरह तो किसी ज़ुल्फ़ की शिकन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 15th May 2024

    न हम मिसाल-ए-सबा!

    न हम क़फ़स में रुके मिस्ल-ए-बू-ए-गुल सय्याद, न हम मिसाल-ए-सबा हल्क़ा-ए-रसन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी

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