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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 18th May 2024

    सलामत है जिस्म अभी

    ये भी बड़ा करम है सलामत है जिस्म अभी, ऐ ख़ुसरवान-ए-शहर क़बाएँ मुझे न दो| अहमद फ़राज़

  • 18th May 2024

    दुआएँ मुझे न दो!

    जो ज़हर पी चुका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया, अब तुम तो ज़िंदगी की दुआएँ मुझे न दो| अहमद फ़राज़

  • 18th May 2024

    सदाएँ मुझे न दो!

    शो‘ला था जल-बुझा हूँ हवाएँ मुझे न दो, मैं कब का जा चुका हूँ सदाएँ मुझे न दो| अहमद फ़राज़

  • 18th May 2024

    प्रिय! सान्ध्य गगन!  

    आज एक बार फिर मैं छायावाद युग की प्रमुख कवियित्री स्वर्गीया महादेवी वर्मा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीया महादेवी वर्मा जी की यह कविता – प्रिय ! सान्ध्य गगनमेरा जीवन!यह क्षितिज बना धुँधला विराग,नव अरुण अरुण मेरा सुहाग,छाया सी…

  • 17th May 2024

    वो गुनाहगार चले गए!

    न रहा जुनून-ए-रुख़-ए-वफ़ा ये रसन ये दार करोगे क्या, जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था वो गुनाहगार चले गए|     फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 

  • 17th May 2024

    बज़्म-ए-यार चले गए!

    ये हमीं थे जिन के लिबास पर सर-ए-रह सियाही लिखी गई, यही दाग़ थे जो सजा के हम सर-ए-बज़्म-ए-यार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 17th May 2024

    सभी इख़्तियार चले गए!

    न सवाल-ए-वस्ल न अर्ज़-ए-ग़म न हिकायतें न शिकायतें, तिरे अहद में दिल-ए-ज़ार के सभी इख़्तियार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 17th May 2024

    मिरे ग़म-गुसार चले गए!

    तिरी कज-अदाई* से हार के शब-ए-इंतिज़ार चली गई, मिरे ज़ब्त-ए-हाल से रूठ कर मिरे ग़म-गुसार चले गए| *Disloyalty फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 17th May 2024

    यहीं!  

    आज एक बार फिर मैं छायावाद युग के प्रमुख स्तंभ और ‘राम की शक्तिपूजा’ जैसे अमर काव्य के रचयिता स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की यह कविता – मधुर मलय…

  • 16th May 2024

    सर-ए-रहगुज़ार चले गए!

    तिरे ग़म को जाँ की तलाश थी तिरे जाँ-निसार चले गए, तिरी रह में करते थे सर तलब सर-ए-रहगुज़ार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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