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सलामत है जिस्म अभी
ये भी बड़ा करम है सलामत है जिस्म अभी, ऐ ख़ुसरवान-ए-शहर क़बाएँ मुझे न दो| अहमद फ़राज़
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दुआएँ मुझे न दो!
जो ज़हर पी चुका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया, अब तुम तो ज़िंदगी की दुआएँ मुझे न दो| अहमद फ़राज़
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सदाएँ मुझे न दो!
शो‘ला था जल-बुझा हूँ हवाएँ मुझे न दो, मैं कब का जा चुका हूँ सदाएँ मुझे न दो| अहमद फ़राज़
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प्रिय! सान्ध्य गगन!
आज एक बार फिर मैं छायावाद युग की प्रमुख कवियित्री स्वर्गीया महादेवी वर्मा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीया महादेवी वर्मा जी की यह कविता – प्रिय ! सान्ध्य गगनमेरा जीवन!यह क्षितिज बना धुँधला विराग,नव अरुण अरुण मेरा सुहाग,छाया सी…
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वो गुनाहगार चले गए!
न रहा जुनून-ए-रुख़-ए-वफ़ा ये रसन ये दार करोगे क्या, जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था वो गुनाहगार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बज़्म-ए-यार चले गए!
ये हमीं थे जिन के लिबास पर सर-ए-रह सियाही लिखी गई, यही दाग़ थे जो सजा के हम सर-ए-बज़्म-ए-यार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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सभी इख़्तियार चले गए!
न सवाल-ए-वस्ल न अर्ज़-ए-ग़म न हिकायतें न शिकायतें, तिरे अहद में दिल-ए-ज़ार के सभी इख़्तियार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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मिरे ग़म-गुसार चले गए!
तिरी कज-अदाई* से हार के शब-ए-इंतिज़ार चली गई, मिरे ज़ब्त-ए-हाल से रूठ कर मिरे ग़म-गुसार चले गए| *Disloyalty फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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यहीं!
आज एक बार फिर मैं छायावाद युग के प्रमुख स्तंभ और ‘राम की शक्तिपूजा’ जैसे अमर काव्य के रचयिता स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की यह कविता – मधुर मलय…
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सर-ए-रहगुज़ार चले गए!
तिरे ग़म को जाँ की तलाश थी तिरे जाँ-निसार चले गए, तिरी रह में करते थे सर तलब सर-ए-रहगुज़ार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़