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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 19th May 2024

    उसे भूल जाऊँ मैं!

    यारो कहाँ तक और मोहब्बत निभाऊँ मैं, दो मुझ को बद-दुआ‘ कि उसे भूल जाऊँ मैं| क़तील शिफ़ाई

  • 19th May 2024

    दुनिया ख़ूब-सूरत थी!

    ‘फ़राज़’ इश्क़ की दुनिया तो ख़ूब-सूरत थी, ये किस ने फ़ित्ना-ए-हिज्र-ओ-विसाल* रक्खा है|     *Meetings and Separations अहमद फ़राज़

  • 19th May 2024

    हथेली पे गाल रक्खा है

    भरी बहार में इक शाख़ पर खिला है गुलाब, कि जैसे तू ने हथेली पे गाल रक्खा है| अहमद फ़राज़

  • 19th May 2024

    ख़याल रक्खा है!

    हिसाब-ए-लुत्फ़-ए-हरीफ़ाँ किया है जब तो खुला, कि दोस्तों ने ज़ियादा ख़याल रक्खा है| अहमद फ़राज़

  • 19th May 2024

    भले दिनों का भरोसा!

    भले दिनों का भरोसा ही क्या रहें न रहें, सो मैंने रिश्ता-ए-ग़म को बहाल रक्खा है| अहमद फ़राज़

  • 19th May 2024

    प्रेम का सौदा!  

    आज एक बार फिर मैं ओज और शृंगार दोनों क्षेत्रों में श्रेष्ठतम रचनाएं देने वाले, राष्ट्रकवि स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की यह कविता – सत्य का जिसके हृदय में…

  • 18th May 2024

    ये किस ने पैरहन!

    हवा में नश्शा ही नश्शा फ़ज़ा में रंग ही रंग, ये किस ने पैरहन अपना उछाल रक्खा है| अहमद फ़राज़

  • 18th May 2024

    लौ को सँभाल रक्खा है

    अगरचे ज़ोर हवाओं ने डाल रक्खा है, मगर चराग़ ने लौ को सँभाल रक्खा है| अहमद फ़राज़

  • 18th May 2024

    सदाएँ मुझे न दो!

    ऐसा न हो कभी कि पलट कर न आ सकूँ, हर बार दूर जा के सदाएँ मुझे न दो| अहमद फ़राज़

  • 18th May 2024

    सलामत है जिस्म अभी

    ये भी बड़ा करम है सलामत है जिस्म अभी, ऐ ख़ुसरवान-ए-शहर क़बाएँ मुझे न दो| अहमद फ़राज़

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