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छुपे हुए उलझाव बहुत
अपने-आप में उलझी हुई इक दुनिया है हर शख़्स यहाँ, सुलझे हुए ज़ेहनों में भी हैं छुपे हुए उलझाव बहुत| क़ैसर शमीम
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नहीं घुमाव बहुत!
सोच का है ये फेर कि यारो पेच-ओ-ख़म की दुनिया में, ढूँढ रहे हो ऐसा रस्ता जिस में नहीं घुमाव बहुत| क़ैसर शमीम
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आज दबाव बहुत!
बहके बहके से बादल हैं क्या जाने ये जाएँ किधर, बदली हुई हवाओं का है उन पर आज दबाव बहुत| क़ैसर शमीम
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टकराव बहुत!
होने लगे हैं रस्ते रस्ते, आपस के टकराव बहुत, एक साथ के चलने वालों में भी है अलगाव बहुत| क़ैसर शमीम
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चढ़ गया दिल पर इशारों का नशा!
आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध हिन्दी गीत एवं ग़ज़ल लेखक स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| गर्ग जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी का यह गीत – उनके कहने से गुनहगार हुए बैठे हैं,उनकी ख़ातिर ही…
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हर एक सुनता था!
वो चीख़ उभरी बड़ी देर गूँजी डूब गई, हर एक सुनता था लेकिन कोई हिला भी नहीं| जावेद अख़्तर
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अब गिला भी नहीं!
कभी जो तल्ख़-कलामी थी वो भी ख़त्म हुई, कभी गिला था हमें उन से अब गिला भी नहीं| जावेद अख़्तर
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कभी मिला भी नहीं!
कभी तो बात की उस ने कभी रहा ख़ामोश, कभी तो हँस के मिला और कभी मिला भी नहीं| जावेद अख़्तर
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कुछ हुआ भी नहीं!
कभी ये लगता है अब ख़त्म हो गया सब कुछ, कभी ये लगता है अब तक तो कुछ हुआ भी नहीं| जावेद अख़्तर
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तिरा तो कोई ख़ुदा है!
मैं कब से कितना हूँ तन्हा तुझे पता भी नहीं, तिरा तो कोई ख़ुदा है मिरा ख़ुदा भी नहीं| जावेद अख़्तर