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दौर में महबूब रहे हैं!
वो लोग ही हर दौर में महबूब रहे हैं, जो इश्क़ में तालिब नहीं मतलूब* रहे हैं| *प्रेमपात्र जाँ निसार अख़्तर
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बहुत क़रीब थे हम!
मैं तेरी ज़ात में गुम हो सका न तू मुझ में, बहुत क़रीब थे हम फिर भी फ़ासला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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सुई!
आज मैं हिन्दी और राजस्थानी भाषाओं के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय हरीश भादानी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| भादानी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरीश भादानी जी का यह गीत – सुबह उधेड़े शाम उधेड़ेबजती हुई सुई सीलन और धुएं के खेतों दिन भर…
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मुक़ाबला तो रहा|
चलो न इश्क़ ही जीता न अक़्ल हार सकी, तमाम वक़्त मज़े का मुक़ाबला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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क़दम क़दम पे कोई!
गुज़र ही आए किसी तरह तेरे दीवाने, क़दम क़दम पे कोई सख़्त मरहला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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हौसला तो रहा!
तमाम उम्र अज़ाबों का सिलसिला तो रहा, ये कम नहीं हमें जीने का हौसला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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वगर्ना ज़िंदगी ने तो!
ये शुक्र है कि मिरे पास तेरा ग़म तो रहा, वगर्ना ज़िंदगी ने तो रुला दिया होता| गुलज़ार
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मुझे सलीब पे दो पल!
ये दर्द जिस्म के या-रब बहुत शदीद लगे, मुझे सलीब पे दो पल सुला दिया होता| गुलज़ार
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मैंने बुझा दिया होता!
न रौशनी कोई आती मिरे तआ‘क़ुब* में, जो अपने-आप को मैं ने बुझा दिया होता| *पीछा करते हुए गुलज़ार
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फूल झरे!
आज मैं प्रसिद्ध हिन्दी नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| श्री मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – फूल झरे जोगिन के द्वारहरी-हरी अँजुरी मेंभर-भर के प्रीत नईरात करे चाँद की गुहार…