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जो हो सके तो चला आ
फ़ज़ा उदास है रुत मुज़्महिल है मैं चुप हूँ, जो हो सके तो चला आ किसी की ख़ातिर तू| अहमद फ़राज़
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दुनिया तुझे बदल देगी
मैं जानता हूँ कि दुनिया तुझे बदल देगी, मैं मानता हूँ कि ऐसा नहीं ब-ज़ाहिर तू| अहमद फ़राज़
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तिरा ख़याल कि!
मिरी मिसाल कि इक नख़्ल-ए-ख़ुश्क-ए-सहरा हूँ, तिरा ख़याल कि शाख़-ए-चमन का ताइर तू | अहमद फ़राज़
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हुई है शाम तो!
हुई है शाम तो आँखों में बस गया फिर तू, कहाँ गया है मिरे शहर के मुसाफ़िर तू| अहमद फ़राज़
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दिल्लियाँ!
आज एक बार मैं विख्यात हिन्दी कवि स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की यह कविता- हाथी की नंगी पीठ परघुमाया गया दाराशिकोह को गली-गलीऔर दिल्ली चुप रही लोहू की…
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आइना देखा करो!
तैश में आने लगे तुम तो मिरी तन्क़ीद पर, इस क़दर हस्सास हो तो आइना देखा करो| मंज़र भोपाली
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ईमान का सौदा करो!
रहनुमा ये दर्स हम को दे रहे हैं आज-कल, बेच दो सच्चाइयाँ ईमान का सौदा करो| मंज़र भोपाली
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हादसों का ख़ौफ़ ले!
ज़िंदगी के नाम-लेवा मौत से डरते नहीं, हादसों का ख़ौफ़ ले कर घर से मत निकला करो| मंज़र भोपाली
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फूल कहते हैं तुम्हें!
ख़ुद को पोशीदा न रक्खो बंद कलियों की तरह, फूल कहते हैं तुम्हें सब लोग तो महका करो| मंज़र भोपाली