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उजला बादल!
आज एक बार मैं श्रेष्ठ हिन्दी नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत- सिरफिरी हवाओं के बलउड़ा करे उजला बादल । सूरज से कौन अब डरेकोहरा इतना…
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सदा क्यूँ नहीं देते!
क्या बीत गई अब के ‘फ़राज़’ अहल-ए-चमन पर, यारान-ए-क़फ़स मुझ को सदा क्यूँ नहीं देते| अहमद फ़राज़
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रहबर हो तो!
रहज़न हो तो हाज़िर है मता-ए-दिल-ओ-जाँ भी, रहबर हो तो मंज़िल का पता क्यूँ नहीं देते| अहमद फ़राज़
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मुजरिम हैं अगर हम
मुंसिफ़ हो अगर तुम तो कब इंसाफ़ करोगे, मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँ नहीं देते| अहमद फ़राज़
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दर्द बढ़ा क्यूँ नहीं देते!
इक ये भी तो अंदाज़-ए-इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ है, ऐ चारागरो दर्द बढ़ा क्यूँ नहीं देते| अहमद फ़राज़
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बुझा क्यूँ नहीं देते!
वहशत का सबब रौज़न-ए-ज़िंदाँ तो नहीं है, मेहर ओ मह ओ अंजुम को बुझा क्यूँ नहीं देते| अहमद फ़राज़
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दुआ क्यूँ नहीं देते!
ख़ामोश हो क्यूँ दाद-ए-जफ़ा क्यूँ नहीं देते, बिस्मिल हो तो क़ातिल को दुआ क्यूँ नहीं देते| अहमद फ़राज़
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पराये मन की कौन सुने!
आज एक बार मैं विख्यात हिन्दी कवि स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का यह गीत- पराये मन की कौन सुने?अपनी पीर सभी को प्यारी,पीर पराई क्या बेचारी;मुक्ति-मंत्र जग को रुचिकर,बंधन…
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और सिर्फ़ शाएर तू!
‘फ़राज़’ तू ने उसे मुश्किलों में डाल दिया, ज़माना साहब-ए-ज़र और सिर्फ़ शाएर तू| अहमद फ़राज़
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जो हो सके तो चला आ
फ़ज़ा उदास है रुत मुज़्महिल है मैं चुप हूँ, जो हो सके तो चला आ किसी की ख़ातिर तू| अहमद फ़राज़