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पर मुझे इस मुल्क में
मैं बहुत कमज़ोर था इस मुल्क में हिजरत के बा‘द, पर मुझे इस मुल्क में कमज़ोर–तर उस ने किया| मुनीर नियाज़ी
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उम्र मेरी थी मगर!
मेरी सारी ज़िंदगी को बे-समर* उस ने किया, उम्र मेरी थी मगर उस को बसर उस ने किया| *निष्फल मुनीर नियाज़ी
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तबीअ’त नहीं मिली!
कुछ दिन के बा‘द उस से जुदा हो गए ‘मुनीर‘, उस बेवफ़ा से अपनी तबीअ‘त नहीं मिली| मुनीर नियाज़ी
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मोहलत नहीं मिली!
कहना था जिस को उस से किसी वक़्त में मुझे, इस बात के कलाम की मोहलत नहीं मिली| मुनीर नियाज़ी
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अब तक हैं इस गुमाँ में
अब तक हैं इस गुमाँ में कि हम भी हैं दहर* में, इस वहम से नजात की सूरत नहीं मिली| *दुनिया मुनीर नियाज़ी
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इन बस्तियों में हमको
थी जिस की जुस्तुजू वो हक़ीक़त नहीं मिली, इन बस्तियों में हम को रिफ़ाक़त नहीं मिली| मुनीर नियाज़ी
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चम्बल एक नदी का नाम!
आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठकवि श्री नरेश मेहता जी की एक कविता का पहला अंश शेयर कर रहा हूँ| मेहता जी की अधिक रचनाएं मैंने शायद पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नरेश मेहता जी की यह कविता- यह महाराजा रन्तिदेव के अग्निहोत्र मेंकाटी गई सहस्त्रों गायों और बछड़ों केबहे ख़ून…
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सुब्ह को रो रो शाम करो!
‘मीर‘ से बैअ‘त की है तो ‘इंशा‘ मीर की बैअ‘त भी है ज़रूर, शाम को रो रो सुब्ह करो अब सुब्ह को रो रो शाम करो| इब्न-ए-इंशा
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सवाब का काम करो!
दिल की मताअ‘ तो लूट रहे हो हुस्न की दी है ज़कात कभी, रोज़-ए-हिसाब क़रीब है लोगो कुछ तो सवाब का काम करो| इब्न-ए-इंशा