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झूट बोला है तो!
झूट बोला है तो क़ाएम भी रहो उस पर ‘ज़फ़र’, आदमी को साहब-ए-किरदार होना चाहिए| ज़फ़र इक़बाल
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कुछ न कुछ आख़िर!
दोस्ती के नाम पर कीजे न क्यूँकर दुश्मनी, कुछ न कुछ आख़िर तरीक़-ए-कार होना चाहिए| ज़फ़र इक़बाल
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काम आसाँ है इसे !
बात पूरी है अधूरी चाहिए ऐ जान-ए-जाँ, काम आसाँ है इसे दुश्वार होना चाहिए| ज़फ़र इक़बाल
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दीदार से आगे की बात!
अब वही करने लगे दीदार से आगे की बात, जो कभी कहते थे बस दीदार होना चाहिए| ज़फ़र इक़बाल
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वो जो दरिया है तो!
डूब कर मरना भी उसलूब-ए-मोहब्बत हो तो हो, वो जो दरिया है तो उस को पार होना चाहिए| ज़फ़र इक़बाल
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ख़्वाब की ताबीर पर!
ख़्वाब की ताबीर पर इसरार है जिन को अभी, पहले उन को ख़्वाब से बेदार होना चाहिए| ज़फ़र इक़बाल
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ख़ामुशी अच्छी नहीं!
ख़ामुशी अच्छी नहीं इंकार होना चाहिए, ये तमाशा अब सर-ए-बाज़ार होना चाहिए| ज़फ़र इक़बाल
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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-3
मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज तीसरा दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी…
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और अभी हम कब तलक!
ऐ रुख़-ए-ज़ेबा बता दे और अभी हम कब तलक, तीरगी को शम-ए-तन्हाई को परवाना कहें| मजरूह सुल्तानपुरी
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दिल को वीराना कहें!
पारा-ए-दिल है वतन की सरज़मीं मुश्किल ये है, शहर को वीरान या इस दिल को वीराना कहें| मजरूह सुल्तानपुरी