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मुसीबत उसे भी थी!
‘मोहसिन’ मैं उस से कह न सका यूँ भी हाल दिल, दरपेश एक ताज़ा मुसीबत उसे भी थी| मोहसिन नक़वी
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तन्हा हुआ सफ़र में!
तन्हा हुआ सफ़र में तो मुझ पे खुला ये भेद, साए से प्यार धूप से नफ़रत उसे भी थी| मोहसिन नक़वी
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क़यामत उसे भी थी!
वो मुझ से बढ़ के ज़ब्त का आदी था जी गया, वर्ना हर एक साँस क़यामत उसे भी थी| मोहसिन नक़वी
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अदावत उसे भी थी!
मुझ से बिछड़ के शहर में घुल-मिल गया वो शख़्स, हालाँकि शहर-भर से अदावत उसे भी थी| मोहसिन नक़वी
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फ़राग़त उसे भी थी!
उस रात देर तक वो रहा महव-ए-गुफ़्तुगू, मसरूफ़ मैं भी कम था फ़राग़त* उसे भी थी| *निश्चिंतता मोहसिन नक़वी
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मुझ को भी शौक़ था!
मुझ को भी शौक़ था नए चेहरों की दीद का, रस्ता बदल के चलने की आदत उसे भी थी| मोहसिन नक़वी
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मोहब्बत उसे भी थी!
ज़िक्र-ए-शब-ए-फ़िराक़ से वहशत उसे भी थी, मेरी तरह किसी से मोहब्बत उसे भी थी| मोहसिन नक़वी
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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-4
मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज चौथा दिन है। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, पहली बार श्रीकृष्ण…
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झूट बोला है तो!
झूट बोला है तो क़ाएम भी रहो उस पर ‘ज़फ़र’, आदमी को साहब-ए-किरदार होना चाहिए| ज़फ़र इक़बाल