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वतन की ज़मीन लाए हैं!
हँसो न हम पे कि हर बद-नसीब बंजारे, सरों पे रख के वतन की ज़मीन लाए हैं| राहत इंदौरी
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जो पर्बतों के लिए!
हमारी बात की गहराई ख़ाक समझेंगे, जो पर्बतों के लिए ख़ुर्दबीन लाए हैं| राहत इंदौरी
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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-12
मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज बारहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ। जैसा मैंने पहले…
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ग़ज़ल की ज़मीन लाए हैं!
चमकते लफ़्ज़ सितारों से छीन लाए हैं, हम आसमाँ से ग़ज़ल की ज़मीन लाए हैं| राहत इंदौरी
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आँसुओं में भीगने के बा’द!
नर्म-ओ-नाज़ुक हल्के-फुल्के रूई जैसे ख़्वाब थे, आँसुओं में भीगने के बा’द भारी हो गए| राहत इंदौरी
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अहकामात जारी हो गए!
रख दिए जाएँगे नेज़े लफ़्ज़ और होंटों के बीच, ज़िल्ल-ए-सुब्हानी के अहकामात जारी हो गए| राहत इंदौरी
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चाँद पागल हो गया!
रौशनी की जंग में तारीकियाँ पैदा हुईं, चाँद पागल हो गया तारे भिकारी हो गए| राहत इंदौरी
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और पुजारी हो गए!
देवियाँ पहुँचीं थीं अपने बाल बिखराए हुए, देवता मंदिर से निकले और पुजारी हो गए| राहत इंदौरी
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बाप हाकिम था मगर!
फ़ैसले लम्हात के नस्लों पे भारी हो गए, बाप हाकिम था मगर बेटे भिकारी हो गए| राहत इंदौरी