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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 3rd Aug 2024

    फिर भी आए तो

    देर लगी आने में तुम को शुक्र है फिर भी आए तो, आस ने दिल का साथ न छोड़ा वैसे हम घबराए तो. अंदलीब शादानी

  • 3rd Aug 2024

    श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-17

    मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज सत्रहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ। जैसा मैंने पहले…

  • 2nd Aug 2024

    इसी रोज़ को मैं रोता था

    हुआ न मुझ को ख़ुमार आख़िर उन शराबों का, ‘नज़ीर’ आह इसी रोज़ को मैं रोता था. नज़ीर अकबराबादी

  • 2nd Aug 2024

    वो मुझसे पाँव धुलाता

    ग़रज़ दिखाने को आन ओ अदा के सौ आलम, वो मुझ से पाँव धुलाता था और मैं धोता था. नज़ीर अकबराबादी

  • 2nd Aug 2024

    वो आँसू पोंछता जाता

    जो बात हिज्र की आती तो अपने दामन से, वो आँसू पोंछता जाता था और मैं रोता था. नज़ीर अकबराबादी

  • 2nd Aug 2024

    तमाम रात थी और

    तमाम रात थी और कुहनीयाँ ओ लातें थीं, न सोने देता था मुझ को न आप सोता था. नज़ीर अकबराबादी

  • 2nd Aug 2024

    लिपट लिपट के मैं

    लिपट लिपट के मैं उस गुल के साथ सोता था, रक़ीब सुब्ह को मुँह आँसुओं से धोता था. नज़ीर अकबराबादी

  • 2nd Aug 2024

    हँसती हुई निगाह भी

    कुछ इस तरह से वक़्त ने लीं करवटें ‘असद’, हँसती हुई निगाह भी मग़्मूम हो गई| असद भोपाली

  • 2nd Aug 2024

    उन की नज़र के कोई

    उन की नज़र के कोई इशारे न पा सका, मेरे जुनूँ की चारों तरफ़ धूम हो गई| असद भोपाली

  • 2nd Aug 2024

    ख़ुलूस ओ दर्द से

    क़ल्ब ओ ज़मीर बे-हिस ओ बे-जान हो गए, दुनिया ख़ुलूस ओ दर्द से महरूम हो गई| असद भोपाली

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