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और फिर वो ही!
एक ही बार नज़र पड़ती है उन पर ‘ताबिश’, और फिर वो ही लगातार नज़र आते हैं| ज़ुबैर अली ताबिश
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ज़ख़्म भरने लगे हैं!
ज़ख़्म भरने लगे हैं पिछली मुलाक़ातों के, फिर मुलाक़ात के आसार नज़र आते हैं| ज़ुबैर अली ताबिश
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हर तरफ़ उसके!
मैं कहाँ जाऊँ करूँ किस से शिकायत उस की, हर तरफ़ उस के तरफ़-दार नज़र आते हैं| ज़ुबैर अली ताबिश
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सब तेरी ओढ़नी के!
रास्ते जो भी चमक-दार नज़र आते हैं, सब तेरी ओढ़नी के तार नज़र आते हैं| ज़ुबैर अली ताबिश
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कविता कैसे लिखते हो तुम!
कल तक मैं अपनी पुरानी कुछ कविताएं शेयर कर रहा था, परंतु फिलहाल जो रचनाएं शेयर कर रहा हूँ, वह उतनी पुरानी नहीं, हाल ही की हैं| राजनैतिक विचार देने में अक्सर संकट शामिल होता है, लेकिन मुझे लगता है कि यह काम भी कभी-कभी करना चाहिए, भले ही वह धारा के विरुद्ध जाता हो|…
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जो चाहो अब रंग भरो!
अब तुम सोचो अब तुम जानो जो चाहो अब रंग भरो, हम ने तो इक नक़्शा खींचा इक ख़ाका तय्यार किया| जाँ निसार अख़्तर
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लोगों को बेदार किया!
महफ़िल पर जब नींद सी छाई सब के सब ख़ामोश हुए, हम ने तब कुछ शेर सुनाया लोगों को बेदार किया| जाँ निसार अख़्तर
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दिल का कारोबार किया!
इश्क़ में क्या नुक़सान नफ़ा है हम को क्या समझाते हो, हम ने सारी उम्र ही यारो दिल का कारोबार किया| जाँ निसार अख़्तर
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ये दौरे भी तन्हाई के!
हम पर कितनी बार पड़े ये दौरे भी तन्हाई के, जो भी हम से मिलने आया मिलने से इंकार किया| जाँ निसार अख़्तर