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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 9th Aug 2024

    और फिर वो ही!

    एक ही बार नज़र पड़ती है उन पर ‘ताबिश’, और फिर वो ही लगातार नज़र आते हैं| ज़ुबैर अली ताबिश

  • 9th Aug 2024

    ज़ख़्म भरने लगे हैं!

    ज़ख़्म भरने लगे हैं पिछली मुलाक़ातों के, फिर मुलाक़ात के आसार नज़र आते हैं| ज़ुबैर अली ताबिश

  • 9th Aug 2024

    हर तरफ़ उसके!

    मैं कहाँ जाऊँ करूँ किस से शिकायत उस की, हर तरफ़ उस के तरफ़-दार नज़र आते हैं| ज़ुबैर अली ताबिश

  • 9th Aug 2024

    आप तो ख़ैर!

    कोई पागल ही मोहब्बत से नवाज़ेगा मुझे, आप तो ख़ैर समझदार नज़र आते हैं| ज़ुबैर अली ताबिश

  • 9th Aug 2024

    सब तेरी ओढ़नी के!

    रास्ते जो भी चमक-दार नज़र आते हैं, सब तेरी ओढ़नी के तार नज़र आते हैं| ज़ुबैर अली ताबिश

  • 9th Aug 2024

    कविता कैसे लिखते हो तुम!

    कल तक मैं अपनी पुरानी कुछ कविताएं शेयर कर रहा था, परंतु फिलहाल जो रचनाएं शेयर कर रहा हूँ, वह उतनी पुरानी नहीं, हाल ही की हैं| राजनैतिक विचार देने में अक्सर संकट शामिल होता है, लेकिन मुझे लगता है कि यह काम भी कभी-कभी करना चाहिए, भले ही वह धारा के विरुद्ध जाता हो|…

  • 8th Aug 2024

    जो चाहो अब रंग भरो!

    अब तुम सोचो अब तुम जानो जो चाहो अब रंग भरो, हम ने तो इक नक़्शा खींचा इक ख़ाका तय्यार किया| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Aug 2024

    लोगों को बेदार किया!

    महफ़िल पर जब नींद सी छाई सब के सब ख़ामोश हुए, हम ने तब कुछ शेर सुनाया लोगों को बेदार किया| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Aug 2024

    दिल का कारोबार किया!

    इश्क़ में क्या नुक़सान नफ़ा है हम को क्या समझाते हो, हम ने सारी उम्र ही यारो दिल का कारोबार किया| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Aug 2024

    ये दौरे भी तन्हाई के!

    हम पर कितनी बार पड़े ये दौरे भी तन्हाई के, जो भी हम से मिलने आया मिलने से इंकार किया| जाँ निसार अख़्तर

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