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किस मंज़िल-ए-मुराद
किस मंज़िल-ए-मुराद की जानिब रवाँ हैं हम, ऐ रह-रवान-ए-ख़ाक-बसर पूछते चलो| साहिर लुधियानवी
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पाला हुआ पक्षी पिंजरे में था- रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत…
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मगर पूछते चलो!
जो ख़ुद को कह रहे हैं कि मंज़िल-शनास हैं, उन को भी क्या ख़बर है मगर पूछते चलो| साहिर लुधियानवी
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ख़बर पूछते चलो!
हम से अगर है तर्क-ए-तअ’ल्लुक़ तो क्या हुआ, यारो कोई तो उन की ख़बर पूछते चलो | साहिर लुधियानवी
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कुर्सी लगा के!
जो मेरे वास्ते कुर्सी लगाया करता था, वो मेरी कुर्सी से कुर्सी लगा के बैठ गया| ज़ुबैर अली ताबिश
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ये मेरा दिल है कि!
तुम्हारे दर से मैं कब उठना चाहता था मगर, ये मेरा दिल है कि मुझ को उठा के बैठ गया| ज़ुबैर अली ताबिश
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मेरी एक और कविता!
आज फिर से पुराना लिखा हुआ कुछ याद आ रहा है, रचना ही कहूँगा इसे भी| जैसा याद आ रहा है, अपनी रचनाओं को शेयर करने के क्रम में इसे भी, जैसा है वैसा ही प्रस्तुत कर रहा हूँ- गीत जो लिखे गए, लिखे गए। किसी एक शर बिंधे, रंगे खग की आकुल चेष्टाओं की…
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दरख़्त काट के जब!
दरख़्त काट के जब थक गया लकड़-हारा, तो इक दरख़्त के साए में जा के बैठ गया| ज़ुबैर अली ताबिश
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वो पास क्या ज़रा सा!
वो पास क्या ज़रा सा मुस्कुरा के बैठ गया, मैं इस मज़ाक़ को दिल से लगा के बैठ गया| ज़ुबैर अली ताबिश