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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 11th Aug 2024

    किस मंज़िल-ए-मुराद

    किस मंज़िल-ए-मुराद की जानिब रवाँ हैं हम, ऐ रह-रवान-ए-ख़ाक-बसर पूछते चलो| साहिर लुधियानवी

  • 11th Aug 2024

    पाला हुआ पक्षी पिंजरे में था- रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत…

  • 10th Aug 2024

    मगर पूछते चलो!

    जो ख़ुद को कह रहे हैं कि मंज़िल-शनास हैं, उन को भी क्या ख़बर है मगर पूछते चलो| साहिर लुधियानवी

  • 10th Aug 2024

    ख़बर पूछते चलो!

    हम से अगर है तर्क-ए-तअ’ल्लुक़ तो क्या हुआ, यारो कोई तो उन की ख़बर पूछते चलो | साहिर लुधियानवी

  • 10th Aug 2024

    अब आएँ या न आएँ!

    अब आएँ या न आएँ इधर पूछते चलो, क्या चाहती है उन की नज़र पूछते चलो| साहिर लुधियानवी

  • 10th Aug 2024

    कुर्सी लगा के!

    जो मेरे वास्ते कुर्सी लगाया करता था, वो मेरी कुर्सी से कुर्सी लगा के बैठ गया| ज़ुबैर अली ताबिश

  • 10th Aug 2024

    ये मेरा दिल है कि!

    तुम्हारे दर से मैं कब उठना चाहता था मगर, ये मेरा दिल है कि मुझ को उठा के बैठ गया| ज़ुबैर अली ताबिश

  • 10th Aug 2024

    मेरी एक और कविता!

    आज फिर से पुराना लिखा हुआ कुछ याद आ रहा है, रचना ही कहूँगा इसे भी| जैसा याद आ रहा है, अपनी रचनाओं को शेयर करने के क्रम में इसे भी, जैसा है वैसा ही प्रस्तुत कर रहा हूँ- गीत जो लिखे गए, लिखे गए। किसी एक शर बिंधे, रंगे खग की आकुल चेष्टाओं की…

  • 9th Aug 2024

    दरख़्त काट के जब!

    दरख़्त काट के जब थक गया लकड़-हारा, तो इक दरख़्त के साए में जा के बैठ गया| ज़ुबैर अली ताबिश

  • 9th Aug 2024

    वो पास क्या ज़रा सा!

    वो पास क्या ज़रा सा मुस्कुरा के बैठ गया, मैं इस मज़ाक़ को दिल से लगा के बैठ गया| ज़ुबैर अली ताबिश

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