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मैं ये उमीद लिए!
कभी तो मेरी भी सुनवाई होगी महफ़िल में, मैं ये उमीद लिए बार बार जाता रहा| जावेद अख़्तर
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क़रार आया तो जैसे!
अजब सा चैन था हम को कि जब थे हम बेचैन, क़रार आया तो जैसे क़रार जाता रहा| जावेद अख़्तर
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कभी निगाह में जो था!
कभी जो सीने में इक आग थी वो सर्द हुई, कभी निगाह में जो था शरार जाता रहा| जावेद अख़्तर
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किसी की आँख में!
किसी की आँख में मस्ती तो आज भी है वही, मगर कभी जो हमें था ख़ुमार जाता रहा| जावेद अख़्तर
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ख़ुलूस तो है मगर!
खुला है दर प तिरा इंतिज़ार जाता रहा, ख़ुलूस तो है मगर ए’तिबार जाता रहा| जावेद अख़्तर
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प्रिया से!
आज एक बार फिर मैं छायावाद के प्रमुख स्तंभ और कविता के शीर्ष पुरुष महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|निराला जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की यह कविता- मेरे इस जीवन की है तू सरस साधना…
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कुछ मेरे तरफ़-दार!
जब से वो अहल-ए-सियासत में हुए हैं शामिल, कुछ अदू* के हैं तो कुछ मेरे तरफ़-दार से हैं| *Opponent गुलज़ार
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रूह से छीले हुए!
रूह से छीले हुए जिस्म जहाँ बिकते हैं, हम को भी बेच दे हम भी उसी बाज़ार से हैं| गुलज़ार
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वक़्त के तीर तो!
वक़्त के तीर तो सीने पे सँभाले हम ने, और जो नील पड़े हैं तिरी गुफ़्तार से हैं| गुलज़ार