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भूल गया घर-आँगन!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ साहित्यकार एवं कवि श्री रामदरश मिश्र जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ|श्री रामदरश जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह ग़ज़ल – भूल गया घर-आँगन यादों से बाहर बाज़ार हुआआज बहुत दिन बाद बेख़ुदी में…
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ग़ज़ाल मोरनी मौजें!
किसी को चलता हुआ देख लें तो चलते बनें, ग़ज़ाल मोरनी मौजें नुजूम अब्र घड़ी| शहज़ाद क़ैस
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चराग़ जुगनू शरर!
किसी के नूर को चुँधिया के देखें हैरत से, चराग़ जुगनू शरर आफ़्ताब फूल-झड़ी| शहज़ाद क़ैस
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किसी के शीरीं-लबों!
किसी के शीरीं-लबों से उधार लेते हैं, मिठास शहद रुतब चीनी क़ंद मिस्री डली| शहज़ाद क़ैस