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तिरे सितम से मैं !
तिरे सितम से मैं ख़ुश हूँ कि ग़ालिबन यूँ भी,मुझे वो शामिल-ए-अरबाब-ए-इम्तियाज़ करे| हसरत मोहानी
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जो चाहे आपका!
ख़िरद का नाम जुनूँ पड़ गया जुनूँ का ख़िरद,जो चाहे आप का हुस्न-ए-करिश्मा-साज़ करे| हसरत मोहानी
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तिरे जुनूँ का ख़ुदा!
दिलों को फ़िक्र-ए-दो-आलम से कर दिया आज़ाद,तिरे जुनूँ का ख़ुदा सिलसिला दराज़ करे| हसरत मोहानी
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निगाह-ए-यार जिसे!
निगाह-ए-यार जिसे आश्ना-ए-राज़ करे,वो अपनी ख़ूबी-ए-क़िस्मत पे क्यूँ न नाज़ करे| हसरत मोहानी
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अनुभूति!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि तथा छायावाद युग के एक स्तंभ स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। पंत जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की यह कविता – तुम आती हो,नव अंगों काशाश्वत मधु-विभव लुटाती हो। बजते नि:स्वर…