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ये नहीं है सही वक़्त!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ कवि श्री राजकुमार कुंभज जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| कुंभज जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘चौथा सप्तक’ में भी इनकी कविताएं शामिल की गई थीं| लीजिए प्रस्तुत है श्री राजकुमार कुंभज जी की यह ग़ज़ल – एक…
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तितली ने ग़ज़ल!
किसी का ज़ुल्फ़ को लहरा के चलना उफ़ तौबा, क़लम हिलाए बिना तितली ने ग़ज़ल कह दी| शहज़ाद क़ैस
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जो उस पे बूँद गिरी!
जो उस पे बूँद गिरी अब्र कपकपा उट्ठा, इस एक लम्हे में काफ़ी घरों पे बिजली गिरी| शहज़ाद क़ैस
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सब की साँस फूल गई!
झुका के नज़रें कोई बोला इल्तिमास-ए-दुआ, किसी को साँस चढ़ा सब की साँस फूल गई| शहज़ाद क़ैस
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परी के पावँ गुलाबी!
परी के पावँ गुलाबी गुदाज़ रक़्स-परस्त, तड़पती मछलियाँ मेहराब-ए-लब थिरकती कली| शहज़ाद क़ैस