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ख़ामोश मोहब्बत का!
हर चीज़ ज़माने की आईना-ए-दिल होती, ख़ामोश मोहब्बत का इतना तो सिला होता| साग़र सिद्दीक़ी
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मैं भी तिरे गुलशन में!
कलियों की महक होता तारों की ज़िया होता, मैं भी तिरे गुलशन में फूलों का ख़ुदा होता| साग़र सिद्दीक़ी
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मेरा ख़याल वक़्त की!
देखी जो रक़्स करती हुई मौज-ए-ज़िंदगी, मेरा ख़याल वक़्त की शहनाई बन गया| साग़र सिद्दीक़ी
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आईना टूट कर तिरी!
बे-साख़्ता बिखर गई जल्वों की काएनात, आईना टूट कर तिरी अंगड़ाई बन गया| साग़र सिद्दीक़ी
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आज है तेरा जनम दिन!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी गीतों के राजकुँवर कहलाने वाले श्रेष्ठ गीतकार स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का यह गीत – आज है तेरा जनम दिन, तेरी…
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इक पल का सामना!
बज़्म-ए -वफ़ा में आप से इक पल का सामना, याद आ गया तो अहद-ए-शनासाई बन गया| साग़र सिद्दीक़ी
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तेरी गली के मोड़ पे!
दैर ओ हरम की राह से दिल बच गया मगर, तेरी गली के मोड़ पे सौदाई बन गया| साग़र सिद्दीक़ी
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मैं आप-अपने घर का!
इस दर्जा इश्क़ मौजिब-ए-रुस्वाई बन गया, मैं आप-अपने घर का तमाशाई बन गया| साग़र सिद्दीक़ी